
पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद सअव का भारत प्रेम और ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है। (फोटो : AI)
ईद मीलादुन्नबी यानी पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के यौम-ए-पैदाइश (जन्मदिन) का मुबारक मौक़ा सिर्फ़ अरब के तपते सेहराओं (रेगिस्तानों) तक महदूद नहीं है, बल्कि इसका ताल्लुक़ हिन्दुस्तान की सरज़मीन से भी बेहद अक़ीदत और एहतराम के साथ जुड़ा हुआ है। इस्लामी इतिहास, हदीसों के ज़ख़ीरे, क़ुरआन की टीकाओं और प्राचीन आसमानी किताबों के पन्नों को जब खंगाला जाता है, तो यह बात साफ़ उभर कर सामने आती है कि हिन्दुस्तान (अरबी में अल-हिन्द) को हमेशा से इल्म, रूहानियत और क़ुदरती ख़ैरो-बरकत का मुक़द्दस केंद्र माना गया।
पैग़ंबर-ए-अकरम के पवित्र जीवन और उनसे जुड़ी रिवायतों में हिन्दुस्तान की मिट्टी, यहां की जड़ी-बूटियों, यहां के बाशिंदों और पूर्व दिशा से आने वाली रूहानी रोशनी की ख़ास अहमियत बयान की गई है। ईद मीलादुन्नबी के इस मौक़े पर आइए जानते हैं कि किस तरह इस्लामिक व क़दीम ऐतिहासिक ग्रंथों में भारत की फ़ज़ीलत और रूहानी मक़ाम का ज़िक्र दर्ज है।
हदीस की मशहूर किताबों में पैग़ंबर-ए-इस्लाम का यह कथन कई उलेमा ने दर्ज किया है:
"मुझे हिन्दुस्तान की जानिब (दिशा) से ख़ुदा की वहदानियत और इल्म की ठंडी हवाएं महसूस होती हैं।
- हवाला: मुसनद अहमद, तफ़सीर-ए-कबीर, अल्लामा इक़बाल की कविता 'बाले-जिबरील' में उद्धृत।
इस रिवायत की व्याख्या करते हुए इस्लामी विचारकों ने लिखा है कि 'ठंडी हवा' से मतलब रूहानी सुकून, हिकमत और तौहीद (एकेश्वरवाद) की वह ख़ुशबू है, जो प्राचीन काल से ही भारत के संतों, तपस्वियों और विचारकों की सरज़मीन से उठती रही। अरब के पूरब में स्थित हिन्दुस्तान को पैग़ंबर साहब ने रूहानी राहत का सबब क़रार दिया। शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल ने इसी हदीस को अपने मशहूर शेर में ढाला था:
“मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहां से,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है।”
क़ुरआन की तफ़सीरों और इतिहास की पुरानी किताबों में दर्ज है कि दुनिया के पहले इंसान और पहले पैग़ंबर हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) जब जन्नत से ज़मीन पर तशरीफ़ लाए, तो उनका पहला क़दम हिन्दुस्तान की सरज़मीन पर पड़ा।
"हज़रत आदम (अ.) को जब ज़मीन पर उतारा गया, तो वह जगह हिन्दुस्तान की सरज़मीन (सरनदीप/दक्षिणी इलाक़ा) थी। आदम अपने साथ जन्नत की ख़ुशबू और पत्तियां लाए थे, जिसकी वजह से हिन्दुस्तान की मिट्टी में ख़ुशबूदार दरख़्त, मसाले और नफ़ासत पैदा हुई।"
-हवाला: तारीख़-ए-तबरी (जिल्द 1), किताबुत तबक़ात अल-कुब्रा (इब्ने साद)
मुफ़स्सिरीन (टीकाकारों) के मुताबिक़, हज़रत अली (रज़ि.) ने फ़रमाया था:
"रूए ज़मीन पर सबसे बेहतरीन और पाकीज़ा वादी हिन्दुस्तान की वह वादी है जहां हज़रत आदम (अ.) का नुज़ूल हुआ था।"
— हवाला: तफ़सीर-ए-दुर्रे मंसूर (इमाम जलालुद्दीन सुयूती)
"तुम 'ऊद-ए-हिन्दी' (भारतीय क़ुदरती जड़ी-बूटी/अगरबत्ती) का इस्तेमाल लाज़मी तौर पर किया करो, क्योंकि इसमें सात मर्ज़ों (बीमारियों) की शिफ़ा मौजूद है।"
— हवाला: सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या: 5692
यह रिवायत साबित करती है कि उस दौर में अरब और हिन्द के दरमियान कारोबारी और इल्मी रिश्ते कितने गहरे थे। पैग़ंबर साहब ने हिन्दुस्तान की क़ुदरती ख़ासियतों और दवाइयों को इंसानी सेहत के लिए मुफ़ीद क़रार दिया।
अरब और भारत के ताल्लुक़ात का सबसे बड़ा ऐतिहासिक सबूत केरल के राजा चेरामन पेरुमल का वाक़िया है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के मुताबिक़:
मलबार (केरल) के राजा चेरामन पेरुमल ने रात के वक़्त चांद के दो टुकड़े होने का मुअज्जिज़ा (चमत्कार) देखा।
जब अरब के तिजारती कारवानों से उन्हें मालूम हुआ कि मक्का में पैग़ंबर-ए-अकरम की आमद हो चुकी है, तो वह ख़ुद समंदरी रास्ते से मदीना-ए-मुनव्वरा पहुंचे।
उन्होंने पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (स.) के दस्त-ए-मुबारक पर इस्लाम क़ुबूल किया और पैग़ंबर की ख़िदमत में हिन्दुस्तान का सोंठ और अदरक का मुरब्बा तोहफ़े में पेश किया।
वापसी के सफ़र में राजा का विसाल (निधन) ओमान के ज़फ़ार इलाक़े में हुआ, मगर उनके साथियों ने केरल के कोडुंगल्लूर में भारत की पहली मस्जिद'चेरामन जुमा मस्जिद' तामीर की।
(हवाला: तारीख़-ए-फ़रिश्ता, तुहफ़ातुल मुजाहिदीन)
इस्लामी विद्वानों और प्राचीन तुलनात्मक धर्मशास्त्रियों ने पुरानी आसमानी किताबों के हवाले से भी पैग़ंबर साहब के सार्वभौमिक संदेश को उजागर किया है:
तौरेत (Deuteronomy 33:2): "ख़ुदा सीनाई से आया, सईर से उन पर चमका, और फ़ारान (अरब) के पहाड़ों से अपना जलाल ज़ाहिर किया।"
इंजील (Gospel of John 14:16): हज़रत ईसा (अ.) ने 'फ़ारक़लीत' (सच्चाई की रूह / मददगार) के आने की बशारत दी, जिसे उलमा ने पैग़ंबर मुहम्मद की आमद से जोड़ा।
ज़बूर (Psalms 72:8-10): शांति और न्याय के उस वैश्विक पैग़ाम का ज़िक्र मिलता है जिसका असर समंदर पार के मुल्कों-हिन्द महासागर तक- पहुaचने की बात कही गई।
क़ुरआन मजीद की सूरह अल-अंबिया (आयत 107) में फ़रमाया गया:
"वमा अर्सलनाका इल्ला रहमतल लिल-आलमीन"
(और हमने आपको तमाम जहानों और पूरी मानवता के लिए सिर्फ़ रहमत बनाकर भेजा है।)
यहां 'आलमीन' का मतलब सिर्फ़ कोई ख़ास क़ौम या अरब ख़ित्ता नहीं, बल्कि पूरी कायनात और दुनिया का हर कोना है, जिसमें भारत भी शामिल है। इसके अलावा सूरह अद-दह्र (आयत 17) में जन्नत के शरबत का ज़िक्र करते हुए 'ज़ंजबील' (सोंठ/अदरक) और 'काफ़ूर' (कपूर) जैसे अल्फ़ाज़ आए हैं, जिन्हें भाषाविदों ने प्राचीन भारतीय व्यापारिक शब्दावली से जुड़ा हुआ माना है।
| स्रोत / ग्रंथ | दर्ज ऐतिहासिक संदर्भ | मुख्य आध्यात्मिक व सामाजिक संदेश |
| मुसनद अहमद | हिन्द की जानिब से ठंडी हवाओं का अहसास | भारत को ज्ञान और एकेश्वरवाद का केंद्र मानना |
| तारीख़-ए-तबरी | हज़रत आदम (अ.) का हिन्दुस्तान में नुज़ूल | इंसानी सभ्यता और पैग़म्बरी सिलसिले की पहली ज़मीन |
| सहीह बुख़ारी | 'ऊद-ए-हिन्दी' में सात बीमारियों की शिफ़ा | भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा व जड़ी-बूटियों का सम्मान |
| तफ़सीर-ए-दुर्रे मंसूर | हिन्द की घाटी को पाकीज़ा तरीन क़रार देना | भारत की सरज़मीन की प्राकृतिक व रूहानी पवित्रता |
| तारीख़-ए-फ़रिश्ता | राजा चेरामन पेरुमल का मदीना आगमन | भारत और अरब के बीच प्राचीन ऐतिहासिक व सांस्कृतिक भाईचारा |
| सूरह अल-अंबिया | 'रहमतुल-लिल-आलमीन' का सार्वभौमिक पैग़ाम | समस्त मानव जाति के लिए दया, शांति और करुणा की तालीम |
| जामेअ तिर्मिज़ी | दूर-दराज़ मुल्कों तक इल्म की तलाश की तालीम | ज्ञान प्राप्ति के लिए भौगोलिक सीमाओं से परे जाने का आह्वान |
जामेअ तिर्मिज़ी दूर-दराज़ मुल्कों तक इल्म की तलाश की तालीम ज्ञान प्राप्ति के लिए भौगोलिक सीमाओं से परे जाने का आह्वान
पैग़ंबर-ए-इस्लाम के इसी मुहब्बत भरे पैग़ाम को आगे चलकर हिन्दुस्तान में ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, बाबा फ़रीद और अमीर ख़ुसरो जैसे सूफ़ियों ने घर-घर पहुँचाया। सूफ़ियों ने हिन्दुस्तान की मिट्टी को अपनी रूहानी साधना का केंद्र बनाया और 'सुलह-ए-कुल' (सबके साथ शांति) का फलसफ़ा देकर भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को परवान चढ़ाया।
ईद मीलादुन्नबी का दिन हमें याद दिलाता है कि पैग़ंबर मुहम्मद (स.) का पैग़ाम किसी भौगोलिक दायरे में क़ैद नहीं है। हिन्दुस्तान की मुक़द्दस मिट्टी, यहाँ की ठंडी हवाएँ और यहाँ का सांस्कृतिक सौहार्द सदियों से उस नबवी पैग़ाम की गवाही दे रहे हैं, जो इंसानियत, भाईचारे और अमन का सबसे बड़ा अलमबरदार है।
Updated on:
26 Aug 2026 12:17 pm
Published on:
26 Aug 2026 12:16 pm
