
Assam Flood Causes and Solutions : असम में बाढ़ आने के क्या कारण हैं?
असम में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन 2026 की बाढ़ ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दशकों से तटबंध, नदी संरक्षण और राहत पर पैसा खर्च होने के बावजूद हर साल असम का बड़ा हिस्सा पानी में क्यों डूब जाता है?
इस सवाल की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इस साल की बाढ़ बेहद विनाशकारी रही। अगस्त के मध्य तक राज्य में बाढ़ से 104 लोगों की मौत और 78 हजार से ज्यादा लोगों के प्रभावित होने की रिपोर्ट आई थी। जुलाई में ही 7.21 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ की चपेट में आ चुके थे।
इसी बीच असम सरकार ने अगले पांच वर्षों में ₹1.5 लाख करोड़ के पूंजीगत खर्च की योजना बताई है, जिसमें बाढ़ प्रभावित इलाकों का पुनर्निर्माण भी अहम हिस्सा है। हालिया बाढ़ से हुए नुकसान की मरम्मत और पुनर्वास के लिए राज्य सरकार ने ₹1,000 करोड़ से ज्यादा की जरूरत का अनुमान भी लगाया है। लेकिन असली सवाल यही है—क्या ज्यादा पैसा असम को बाढ़ से बचा सकता है?
असम की भौगोलिक स्थिति ही उसे देश के सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल करती है। राज्य का करीब 31.05 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ संभावित है, जो उसके कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 39.58% है। राज्य सरकार के मुताबिक हर साल औसतन करीब 9.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है। यानी यहां बाढ़ केवल किसी एक नदी या किसी एक जिले की समस्या नहीं है।
असम में दो बड़े नदी तंत्र हैं ब्रह्मपुत्र और बराक। ब्रह्मपुत्र घाटी में करीब 20 प्रमुख उत्तरी और 13 प्रमुख दक्षिणी सहायक नदियां मिलती हैं। इन नदियों में बारिश के दौरान अचानक पानी बढ़ता है और जब कई नदियों की बाढ़ एक साथ ब्रह्मपुत्र में मिलती है, तब स्थिति और गंभीर हो जाती है।
| नदी/सहायक नदी | प्रमुख प्रभावित क्षेत्र/जिला |
|---|---|
| ब्रह्मपुत्र | राज्य का बड़ा हिस्सा |
| सुबनसिरी | लखीमपुर, धेमाजी |
| रंगानदी | लखीमपुर |
| जिया भराली | सोनितपुर |
| धनसिरी | गोलाघाट |
| पुथिमारी | कामरूप |
| मानस | कोकराझार |
| बेकी | बारपेटा |
| कोपिली | नगांव |
| बराक | कछार और बराक घाटी |
राज्य सरकार के अनुसार ब्रह्मपुत्र की उत्तरी सहायक नदियां अपेक्षाकृत तेज ढलान वाली हैं, उनमें भारी मात्रा में गाद आती है और उनमें अचानक बाढ़ आने की प्रवृत्ति होती है। दक्षिणी सहायक नदियां अलग भौगोलिक व्यवहार दिखाती हैं। 2026 में भी रंगानदी, धनसिरी, दिक्हो और बुरहिदीहिंग जैसी नदियां कई जगह खतरे के निशान के करीब पहुंची थीं।
असम में बाढ़ नियंत्रण के लिए दशकों से तटबंध बनाए जा रहे हैं। राज्य के जल संसाधन विभाग के अनुसार अब तक करीब 4,474 किलोमीटर तटबंध बनाए जा चुके हैं। इसके अलावा करीब 655.5 किलोमीटर तटबंधों को ऊंचा और मजबूत किया गया है।
राज्य में करीब 911 एंटी-इरोशन और टाउन प्रोटेक्शन कार्य, लगभग 875 किलोमीटर ड्रेनेज योजनाएं, 94 बड़े स्लुइस, 545 छोटे स्लुइस भी बनाए गए हैं। इनसे करीब 16.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सुरक्षा मिलने का दावा राज्य सरकार करती है।
लेकिन उसी सरकारी दस्तावेज में एक बेहद महत्वपूर्ण बात भी कही गई है। अब तक मुख्य रूप से तत्काल और अल्पकालिक उपाय किए गए हैं और बाढ़-क्षरण की समस्या के लिए लंबे समय के उपाय पर्याप्त रूप से लागू नहीं हुए हैं। यही असम की बाढ़ की सबसे बड़ी पहेली है।
तटबंध नदी को एक निश्चित रास्ते में रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन ब्रह्मपुत्र कोई सीधी और स्थिर नदी नहीं है। इसमें भारी मात्रा में गाद आती है और नदी अपना रास्ता बदलती रहती है।
राज्य सरकार के मुताबिक 1950 से अब तक ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों ने 4.27 लाख हेक्टेयर जमीन को काटकर बहा दिया है। औसतन हर साल करीब 8,000 हेक्टेयर जमीन कटाव की चपेट में आती है। इसका मतलब यह है कि समस्या सिर्फ 'पानी ज्यादा आ गया' नहीं है। समस्या तीन स्तरों पर है:
कई जगह तटबंध मजबूत भी कर दिए जाएं, तो नदी दूसरी तरफ कटाव शुरू कर सकती है। असम में सिर्फ बाढ़ नहीं, कटाव भी बड़ी समस्या है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी असम की परेशानी खत्म नहीं होती। नदी का कटाव खेत, घर और गांव तक निगल जाता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ब्रह्मपुत्र का फैलाव भी पिछले एक सदी में काफी बढ़ा है। 1912-28 के सर्वे में नदी का क्षेत्र करीब 3,870 वर्ग किलोमीटर था, जो 2006 के NESAC सर्वे में बढ़कर करीब 6,080 वर्ग किलोमीटर दर्ज हुआ।
इसका असर सिर्फ जमीन पर नहीं पड़ता। जमीन जाने का मतलब है। घर गया → खेत गया → आजीविका गई → परिवार को दूसरी जगह जाना पड़ा। माजुली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। राज्य सरकार के अनुसार ब्रह्मपुत्र के कटाव से माजुली अपने मूल क्षेत्र का करीब 60% हिस्सा खो चुका है।
बाढ़ प्रबंधन पर खर्च को केवल एक मद में देखना सही नहीं होगा। इसमें राहत, पुनर्वास, तटबंध निर्माण, कटाव रोकने, सड़क-पुलों की मरम्मत, जल निकासी और आपदा प्रबंधन जैसे कई खर्च शामिल होते हैं।
केंद्र की Flood Management and Border Areas Programme (FMBAP) के तहत 2021-26 के दौरान असम के लिए पांच परियोजनाएं प्राप्त हुईं, जिनमें एक परियोजना स्वीकृत हुई जिसकी लागत ₹125.21 करोड़ थी। मार्च 2025 तक पिछले पांच वर्षों में इस कार्यक्रम के तहत असम को ₹296.15 करोड़ केंद्रीय सहायता जारी हुई थी।
इसके अलावा असम में विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी संस्थाओं की मदद से नदी कटाव और बाढ़ प्रबंधन की परियोजनाएं भी चल रही हैं। 2026 में ADB समर्थित परियोजना के तहत जोरहाट, गोलाघाट, शिवसागर और मोरीगांव में नदी किनारे सुरक्षा के कई कामों के ठेके दिए गए।
नहीं। यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। बाढ़ को पूरी तरह रोकना असम जैसे राज्य में व्यावहारिक लक्ष्य नहीं है। सरकार भी बाढ़ प्रबंधन के तहत तटबंधों के साथ ड्रेनेज, नदी प्रशिक्षण, कटाव नियंत्रण, स्लुइस, बाढ़ पूर्वानुमान और बाढ़ क्षेत्र निर्धारण जैसे उपाय करती है।
विशेषज्ञों का जोर अब इस बात पर है कि नदी को हर जगह रोकने की कोशिश करने के बजाय बाढ़ के साथ रहने और नुकसान कम करने की रणनीति अपनानी होगी। 2026 की विनाशकारी बाढ़ के बाद विशेषज्ञों ने बेहतर चेतावनी व्यवस्था, प्राकृतिक बाढ़ मैदानों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा, वैज्ञानिक जोखिम मानचित्रण और बेहतर आपदा तैयारी की जरूरत पर जोर दिया है।
असम सरकार का ₹1.5 लाख करोड़ का पांच साल का पूंजीगत खर्च बड़ा अवसर हो सकता है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पैसा सिर्फ बाढ़ के बाद टूटे तटबंध और सड़कें ठीक करने में जाता है या बाढ़ के मूल जोखिम को कम करने वाले ढांचे पर भी खर्च होता है।
क्योंकि असम की समस्या सिर्फ पैसे की कमी नहीं है। भूगोल, भारी मानसूनी बारिश, हिमालयी नदियां, गाद, नदी का बदलता रास्ता, कटाव और बढ़ती बस्तियां-ये सभी एक साथ काम करते हैं। इसलिए असम में लक्ष्य यह नहीं हो सकता कि 'बाढ़ कभी आए ही नहीं।'
असली लक्ष्य होना चाहिए- बाढ़ आए तो जान न जाए, घर और खेत कम से कम बर्बाद हों और लोग सुरक्षित तरीके से वापस अपनी जिंदगी शुरू कर सकें।
यही वजह है कि असम में अगले कुछ वर्षों का सवाल 'कितने किलोमीटर तटबंध बने?' से ज्यादा बड़ा है। सवाल यह है कि हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाला नुकसान आखिर कितना कम हुआ। और अगर ₹1.5 लाख करोड़ खर्च होने के बाद भी हर मानसून में वही तस्वीर लौटती है, तो सवाल पैसे का नहीं, बाढ़ प्रबंधन के मॉडल का होगा।
Updated on:
19 Aug 2026 10:23 am
Published on:
19 Aug 2026 10:23 am
