
लूणकरनसर की नमक की झील वैसे सामान्य ज्ञान की किताबों तक सीमित रह गई है। सरकारी स्तर पर इस झील के सरंक्षण व सम्वद्र्धन का कोई प्रयास नजर नहीं आता। इसलिए हर स्तर पर उपेक्षा की शिकार यह झील अतिक्रमण की मार झेल रही है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। परन्तु प्रकृति ने इस झील को पक्षी विहार के रूप में विकसित कर पर्यटन की नई संभावनाएं जगा दी है।

इस झील के परिक्षेत्र में डेढ़ दर्जन से अधिक देशी व विदेशी प्रजातियों के पक्षी प्रवास करते है। इनमें से कई ऐसे पक्षी भी है जो सामान्य तौर पर प्रदेश के परिवेश में नजर नहीं आते है। कुरजां यानि डोमेशियल क्रेन पक्षी के लिए तो यह झील चर्चित शरणस्थली बना है। जहां सुदूर विदेशों से आकर हजारों की तादाद में कुरजां समूह में यह अपना बसेरा करती है।

सरकारी स्तर लूणकरनसर की झील को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहां पक्षी विज्ञान के शोधार्थियों व प्रकृति से प्रेम रखने वाले पर्यटकों के लिए एक पंसदीदा केन्द्र बन सकता है। पर्यटन के रूप में यह झील लूणकरनसर में आर्थिक विकास का जरिया भी बन सकती है।

लूणकरनसर की नमक की झील पर प्रवासी पक्षियों का कलरव है लोगों को रिझा रहा है। इनमें कुरजां प्रमुख है तथा हजारों की तादाद में देखी जा सकती है। यह प्रवासी पक्षी साइबेरिया, मंगोलिया, चीन आदि क्षेत्रों से सर्दी में प्रवास के लिए यहां आते है। कुरजां हजारों मील का सफर समुन्द्र व पर्वतों की ऊंचाइयों पर उड़ते हुए पूरा करती है। यह पक्षी १६ से २६ हजार फीट ऊंचाई तक उडऩे की क्षमता रखता है।

इनके अलावा झील पर एवोसेट, नॉरदन शावलर, डबचिक, पिनटेल, सेंड पाइपर, शटिलट, कूट, मूर हैन, रूफ, कॉमन टील, रेड शैंक, आईबिस (कुरदांतली), सेंड मार्टिन, पेंटेड स्टॉर्क, पिनटेल, लिटिल कोरमोरेन्ट, फ्लेमिंगो (एशिया व यूरोप के ठण्डे प्रदेशों से आते है) समेत कई प्रजातियों के प्रवासी पक्षी आसानी से देखे जा सकते है।

ये प्रवासी पक्षी लूणकरनसर की जैव विविधता में नए रंग भर रहे है। ये पक्षी एशिया एवं यूरोप के दूरस्थ इलाकों से यहां आते है। हालांकि इन पक्षियों को यहां चुग्गा नहीं डाला जाता इसके बावजूद ये पक्षी अपने भोजन के लिए प्राकृतिक रूप से मौजूद जलीय वनस्पति, कीटों और जलीय जन्तुओं पर निर्भर रहते है।

प्रवासी पक्षी सितम्बर-अक्टूबर आते है तथा फरवरी-मार्च के बाद यहां से वापिस चलते जाते है। यहां पर इन पक्षियों के लिए तापमान व जलवायु सही होने से प्रजनन के लिए भी अनुकूल मानी जाती है। पक्षी अण्डे देने के बाद अपने बच्चों के बड़े होने पर वापिस लौट जाते है।

प्रवासी पक्षियों की स्थिति को देखते हुए झील को संरक्षित करते हुए सुन्दर आवास प्रदान किया जा सकता है। इसमें पक्षियों की आदतन इतिहास के हिसाब से नया लुक दिया जा सकता है तथा इससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की अपार संभावनाएं है।

इस झील में दो-तीन वनस्पति में हैलोजाइलोन (साजी) व सालसोला नाम के औषधीय गुण वाले लवणीय पादप मौजूद है। इन वनस्पति झाडिय़ों की साजी बनाई जाती है तथा पापड़, खिचिया, ढोकला आदि बनाते वक्त जायका बदलने के रूप में काम आती है।

यहां झील क्षेत्र में टेमेरिक्स नामक पीले फूल वाला लवणीय पादप भी पाया जाता है। इस पादप से लवणीय भूमि को सुधार में काम लिया जा सकता है।