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 बांदा तो गए लेकिन दादा को भूल गए राहुल

दादी के घर से चंद कदम दूर था दादा फिरोज जंहागीर गांधी का मजार

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Sarweshwari Mishra

Sep 17, 2016

Rahul Gandhi

Rahul Gandhi

इलाहाबाद. यूपी की सत्ता तक पहुंचने के लिए खेतों की पगडंडियों से लेकर शहर की चौड़ी सड़कों तक नापने में लगे राहुल गांधी पहली बार इतनी करीब से लोगों के बीच पहुंच रहे है। सारी कवायद अपनी अलग नई छवि बनाने और दिखाने की है। देवरिया से दिल्ली तक निकली किसान यात्रा के पहले दिन से राहुल के रास्ते में आने वाले हर धार्मिक स्थल पर सर झुकाया है। मंदिर में तिलक से लेकर मजारों की चादर पोशी का कोई मौका हाथ से नही गंवाया। राहुल का कार्यक्रम तय कर रही टीम पीके यह सुनिश्चित करना चाहती है कि धार्मिक मुद्दा बहस का कारण न बने।




सालों पुरानी कांग्रेस पुरखों की कुर्बानी और देश को आजाद कराने की कहानियों के जरिये नई पीढ़ी तक पहुंचने के जुगत में है। लेकिन हर दर पर जाने वाले राहुल जब अपने पुरखों के घर विरासत के हल से अपनी फसल उगाने के लिए पहुंचे तो नाना और दादी के घर से चंद कदम दूर दादा फिरोज जंहागीर गांधी की मजार पर न फूल चढ़ाया न चादर।

Firoz Gandhi Tomb
बता दे कि देश का सबसे ताकतवर राजनीतिक नेहरू परिवार फिरोज के आने से गांधी हो गया था। फिरोज का ताल्लुक पारसी परिवार से था कहा जाता है कि जब इंदिरा और फिरोज गांधी ने शादी करने के फैसला किया तो इससे नेहरू खफा थे बाद में बेटी की ख़ुशी के लिए वो राज़ी हुए। तब बड़ा सवाल था कि नेहरू के वारिस किस नाम से जाना जाएंगे? जब यह बात महात्मा गांधी तक पहुंची तो उन्होंने इंदिरा और फिरोज को गांधी सरनेम दे दिया। तब से आज तक नेहरू का परिवार गांधी के नाम से चल रहा है। लेकिन पुरखों के नाम पर गलियो में घूमने वाले राहुल दादा की मजार तक नही गये।




शहर के मम्फोड़गंज इलाके पारसी समाज के लोगों का कब्रिस्तान है जहां फिरोज सुपुर्द-ए-ख़ाक किये गए थे। राहुल के स्वराज भवन में रुकने के साथ यह कयास लगाये जा रहे थे की राहुल दादा की मजार पर आएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। अभी फिरोज गांघी का पूरा परिवार इलाहबाद में ही रहता है कभी पारसी लोगो संख्या शहर में 5 से 10 हजार तक थी अब 200 या 500 ही बचे है। कब्रिस्तान की देख रेख करने वालों के मुताबित 15 साल पहले सोनिया गांधी आई थी और काफी पहले राहुल गाँधी। बहरहाल सियासी यात्राओं में जितना बड़ा वोट बैंक उतना समय दिया जाता है।

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