कोरोना को हराने में एंटीबॉडी का पूरा खेल, वहीं हो रही फेल, अब फॉल्स पॉजिटिव आ रहे लोग

अब फॉल्स पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे मरीज जो पहले संक्रमित हुए, मगर उनमें लक्षण नहीं थे। यानी उनके अंदर एंटीबॉडी बनी ही नहीं थी। स्वास्थ्य विभाग के एक आला अधिकारी आरटी-पीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए। ट्रू-नेट रिपोर्ट निगेटिव थी।

By: Karunakant Chaubey

Published: 16 Oct 2020, 11:04 AM IST

रायपुर. प्रदेश में 1.22 लाख लोग अब तक कोरोना को मात दे चुके हैं, जो बड़ी राहत की बात है। लेकिन स्वस्थ होने वाले लोग दोबारा संक्रमित होने से चिंता के साथ कई सवाल उठ रहे हैं। इसका जवाब है शरीर में कोरोना वायरस के विरुद्ध लडऩे वाले एंटीबॉडीज का न बनना। जी, हां हम इस भ्रम न रहे हैं कि स्वस्थ होने के बाद दोबारा संक्रमित नहीं हो सकते।

अब फॉल्स पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे मरीज जो पहले संक्रमित हुए, मगर उनमें लक्षण नहीं थे। यानी उनके अंदर एंटीबॉडी बनी ही नहीं थी। स्वास्थ्य विभाग के एक आला अधिकारी आरटी-पीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए। ट्रू-नेट रिपोर्ट निगेटिव थी। उनके अंदर एंटीबॉडी विकसित ही नहीं हुई। उन्होंने खुद 'पत्रिकाÓ से बातचीत में इसकी पुष्टि की है।

पड़ताल में सामने आया कोरोना संक्रमित होने वालों में से अधिकांश में (करीब 75 प्रतिशत) लक्षण नहीं पाए गए हैं या फिर हल्के लक्षण दिखे। ये अस्पताल में भर्ती हुए या कोविड सेंटर या फिर होम आइसोलेशन में रहे। 4-10 दिन में ये स्वस्थ हो गए। ऐसे में इनके अंदर एंटीबॉडी विकसित हुआ है कि नहीं इसे पता करने का कोई आधार नहीं है। मगर, छत्तीसगढ़ के 10 जिलों में आईसीएमआर द्वारा किए गए सीरो सर्वे की रिपोर्ट इस बात का प्रमाण है कि अभी सिर्फ 5.56 प्रतिशत लोगों में ही एंटीबॉडी विकसित हुई है। जो बहुत कम है। इसलिए हर किसी को १०० प्रतिशत बचाव के लिए सावधानी बरतनी ही होगा।

आरटी-पीसीआर टेस्ट सटीक नहीं

प्रदेश के विशेषज्ञ मानते हैं कि आरटी-पीसीआर टेस्ट भी 100 प्रतिशत सटीक नहीं है। मगर, ये बाकी सभी टेस्ट या उसकी पद्धति से बेहतर है। इसमें 15-20 प्रतिशत मामलों में फॉल्स पॉजिटिव आने की संभावना रहती है। यानी की व्यक्ति संक्रमित नहीं है, फिर भी संक्रमित पाया जाता है। यह डेड सेल्स की वजह से भी होता है।
एंटीबॉडी टेस्ट पर 17 अगस्त से रोक

राज्य सरकार ने 17 अगस्त से प्रदेश में एंटीबॉडी टेस्ट पर रोक लगा दी। इसके पीछे तर्क दिया गया कि लोग आरटी-पीसीआर, ट्रूनेट और रैपिड टेस्ट करवाने के बजाए एंटीबॉडी टेस्ट करवा रहे हैं। जबकि आईसीएमआर ने कहा है कि इस टेस्ट को सिर्फ सर्विलांस/स्क्रीनिंग के लिए किया जाए, जैसे सीरो सर्वे में किया गया था। 17अगस्त के पहले हजारों एंटीबॉजी टेस्ट हुए थे।

एंटीबॉडी टेस्ट की इजाजत सिर्फ इस स्थिति में- राज्य स्वास्थ्य विभाग ने सिर्फ प्लाज्मा थैरेपी के लिए डोनर से प्लाज्मा लेने से पहले एंटीबॉडी टेस्ट की मंजूरी दी है।

अब प्लाज्मा थैरेपी के नियमों में बदलाव

ठीक हो चुके व्यक्तियों में एंटीबॉडी न मिलने पर अस्पतालों ने अब नया क्राइटेरिया बनाया है। अब उन व्यक्तियों के ही प्लाज्मा डोनेशन लिए जाते हैं तो गंभीर रूप से संक्रमित रहे हों या फिर जिनमें लक्षण अधिक दिख हों। वह भी ठीक होने के 28 दिन बाद।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट-

दोबारा संक्रमित होना, यह स्पष्ट करता है कि स्वस्थ हो चुके व्यक्ति में वायरस लोड कम रहा होगा यानी हल्के लक्षण रहे होंगे। एंटीबॉडी बनी होंगी तो कमजोर रही होंगी। इसलिए संक्रमित होकर ठीक हो चुके हैं और निश्चित हो जाएं कि दोबारा संक्रमित नहीं होंगे, इस भूल में न रहें।

-डॉ. गिरीश अग्रवाल, स्पेशलिस्ट, टीबी एंड चेस्ट

शुरुआत में हमने प्लाज्मा थैरेपी के लिए कोरोना को मात दे चुके लोगों से प्लाज्मा डोनेशन लिया एंटीबॉडी टेस्ट करवाया तो पाया कि उनमें बहुत कम में एंटीबॉडी विकसित हुई है। इसलिए फिर क्राइटेरिया में बदला गया।

-डॉ. नीलेश जैन, विभागाध्यक्ष, ट्रांफ्यूजन मेडिसीन, बालको मेडिकल सेंटर

Karunakant Chaubey Desk/Reporting
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