
CG Election 2018: दहशत भरे दुर्गम इलाके में चुनाव कराने आए कोई 'न्यूटन'
रायपुर. छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्र में चुनाव पर आधारित फिल्म न्यूटन आप नहीं भूले होंगे। फिल्म के न्यूटन राजकुमार राव उस पूरी व्यवस्था से टकराने को तैयार हो जाते हैं जो निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया में आड़े आना चाहती है। एक बार पहले फर्जी मतदान को लेकर यह क्षेत्र सुर्खियों में आ चुका है, जिसमें निर्वाचन अधिकारी कठघरे में आ गए थे। बाद में उनसभी को क्लीनचिट मिल गई। अब विधानसभा चुनाव में भी धुर माओवादी इलाकों में चुनाव आयोग को ऐसे कई न्यूटन की जरूरत पड़ेगी जो चुनाव की लोकतांत्रिक प्रणाली पर भरोसा जगाकर आदिवासी ग्रामीणों को मतदान केंद्र तक ला सके। पढ़िए मोहला-मानपुर के जंगलों से नितिन त्रिपाठी की ख़ास रिपोर्ट।
निर्वाचन आयोग ने छत्तीसगढ़ के उन दुर्गम इलाकों की 18 विधानसभा सीटों पर सुरक्षा कारणों से अलग से चुनाव कराने का फैसला किया है। इन सीटों पर 12 नवंबर को मतदान होगा। इन्हीं सीटों में से एक है मोहला-मानपुर। धुर माओवादी इलाकों का मोहला-मानपुर विधानसभा क्षेत्र अब भी उस रास्ते का इंतजार कर रहा है, जिससे चलकर विकास उनके द्वार तक पहुंचेगा। परिसीमन के बाद मोहला और मानपुर को जोडक़र नई विधानसभा की शक्ल तो दी गई, लेकिन यहां और कोई खास बदलाव नहीं आया।
अंदरूनी क्षेत्रों में माओवादियों की धमक आज भी है, जिसकी दहशत का साया यहां रहने वाले आदिवासियों के चेहरों पर साफ नजर आता है। हाल में लाल पर्चे फेंककर चुनाव के बहिष्कार का ऐलान करके माओवादियों ने अपने होने का अहसास कराया है। इसके बाद से अंदरूनी गांवों में तो पूरी तरह चुप्पी है, लगता है मानो किसी ने ताला जड़ दिया हो। यहां पसरा सन्नाटा और लोगों में छाई खामोशी, आपको यहां के हालात का अहसास करा देगी।
यहां दबी जुबान से जो कहा गया उसे जितना जान पाए वह बेहद चौंकाने वाला है प्रशासन तो यहां सुरक्षा के साए में अपनी टेबल-कुर्सी डालकर निर्वाचन प्रक्रिया पूरी कराने की कोशिश करेगा लेकिन आदिवासियों को उस फैसले का इंतजार है जो किसी इशारे पर गांव की सभा लेगी। सभा तय करेगी कि मतदान करना है या नहीं, करना है तो किसके पक्ष में करना है? रेड कॉरिडोर में यह इशारा कौन औैर कब करेगा, यह बात पुलिस-प्रशासन और सुरक्षा बल बखूबी समझते हैं। चुनाव यहां चुनौती है और देश का निर्वाचन आयोग भी इसे मानता है। दावों के विपरीत जमीना स्थिति यह है कि कई गांवों में तो कोई मतदान में हिस्सा लेना भी चाहे तो उसे किलोमीटर चलकर मतदान केंद्र पर पहुंचना होगा। खुर्सेकला के ग्रामीणों को ही ढाई किलोमीटर चलना होगा।
देशभर को हिलानेे वाली घटना और पत्थलगढ़ी आंदोलन का अगुवा गांव
बस्तर का प्रवेश द्वार और छत्तीसगढ़ को महाराष्ट्र से जोडऩे वाले इस क्षेत्र में वर्ष 2009 की एक घटना ने देशभर को हिलाकर रख दिया था। दो राज्यों की जोडऩे वाले मुख्य मार्ग पर माओवादियों ने एंबुश लगाकर पुलिस अधीक्षक वीके चौबे सहित 29 जवान शहीद हो गए थे। कोरकोट्टी गांव की सीमा पर हुई इस घटना के निशान आज भी यहां हैं। इसके बाद एक बार फिर यह इलाका पत्थलगढ़ी आंदोलन को लेकर सुर्खियों में आया। खुर्सेकला गांव में पत्थलगढ़ी के बोर्ड लगा दिए गए थे, जिनको सुरक्षा बलों की मौजूदगी में बोर्ड उखाड़े गए और उन पर लिखी इबारत को पेंट से पोत दिया गया, लेकिन बोर्ड गांव में अब भी एक तरफ टिके पड़े हैं। खुर्सेकला हो या आमाटोला, अंदर के गांवों में कोई चुनाव की बात करने कोई तैयार नहीं हुआ।
Updated on:
18 Oct 2018 01:05 pm
Published on:
18 Oct 2018 01:05 pm
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