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छत्तीसगढ़ में 24 हफ्ते में जन्म लेने वाली मिरेकल बेबी, इन कारणों से डॉक्टर भी मान रहे चमत्कार

सिर्फ 24 हफ्ते में किसी बच्चे का जन्म हो। वजन महज 440 ग्राम हो और लंबाई 20 सेंटीमीटर। क्या वह जीवित रह सकता है? अब तक भारत में ऐसा कोई केस रिपोर्ट नहीं है। मगर, छत्तीसगढ़ के धुर माओवाद प्रभावित जिले बीजापुर अंतर्गत भैरमगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने ऐसा कर दिखाया है। यह मेडिकल साइंस में नया चमत्कार है, नया रेकॉर्ड है। कोरोनाकाल में 5 अप्रैल 2020 को जन्मी यह बच्ची जीवित है और तमाम बीमारियों को हराते हुए, तेजी से ग्रो कर रही है।

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छत्तीसगढ़ में 24 हफ्ते में जन्म लेने वाली मिरेकल बेबी, इन कारणों से डॉक्टर भी मान रहे चमत्कार

छत्तीसगढ़ में 24 हफ्ते में जन्म लेने वाली मिरेकल बेबी, इन कारणों से डॉक्टर भी मान रहे चमत्कार

रायपुर. पूरी दुनिया जहां एक तरफ कोरोना वैश्विक महामारी से जंग लड़ रही है। डॉक्टर लाइलाज बीमारी का इलाज करने में अपनी पूरी ताकत झोंककर जान बचा रहे हैं तो वहीं इसके इतर भी कई जानें बचाई जा रही हैं। भैरमगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) का यह प्रकरण इसका उदाहरण है। 'पत्रिका को डॉक्टरों ने बताया कि हम इसे 'मिरेकल बेबी (चमत्कारी बच्चा) मान रहे हैं। डॉक्टर यह भी कह रहे हैं कि यह बच्ची जिन मुश्किल हालातों से निकली है, वह अपने आप में शोध का विषय है। 5 अप्रैल को भैरमगढ़ सीएचसी में प्रसव पीड़ा के साथ राजेश्वरी गोंडे पहुंची। डॉक्टरों को बताया कि अभी 24 हफ्ते का ही गर्भ है। मां की तेज प्रसव पीड़ा कहीं जच्चा-बच्चा दोनों के लिए परेशानी न पैदा कर दे, डॉक्टरों ने प्रसव करवाने का फैसला लिया। जन्म के बाद डॉक्टर भी बच्चे को देखकर हैरान थे क्योंकि बच्चे गर्भधारण के 36वें से 40वें हफ्ते में जन्म लेते हैं। तब तक उनका हर एक अंग विकसित हो चुका होता है। इसके पहले जन्म लेने वाले बच्चों को प्री-मे'योर बेबी कहा जाता है।

कैसे संघर्ष के गुजरे बच्ची के दिन
जन्म के बाद ही उसे निमोनिया हो गया। फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे तो सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, तो वेंटीलेटर पर थी। हार्ट में छेद है, जिसे दवाओं से भरा जा रहा है। वह दूध नहीं पचा पा रही थी क्योंकि आंते विकसित नहीं हुई थीं। तीन बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया गया। मगर, अभी वह ठीक है। वजन बढ़ रहा है। शारीरिक विकास तो ठीक है, मगर मस्तिष्क का विकास सबसे महत्वपूर्ण है, जो आने वाले दिनों में टेस्ट से पता चलेगा।

सबसे कम वजन का रेकॉर्ड

हैदराबाद के रैनवो अस्पताल में जुलाई 2018 में जन्मी बच्ची (जिसे चेरी नाम दिया गया) जिसकी लंबाई मात्र 20 सेंटीमीटर और वजन 375 ग्राम था। इसे दक्षिण पूर्व एशिया की सबसे छोटी बच्ची माना गया था। जानकारी के मुताबिक यह दंपती राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ का रहने वाला है। मगर, बेबी ऑफ राजेश्वरी 24 हफ्ते में जन्मी, चेरी 25 हफ्ते में।

- नवजात बच्चे की औसत लंबाई 45-50 सेंटीमीटर तक होती है। बेबी ऑफ राजेश्वरी की लंबाई 20 सेंटीमीटर थी।
- बच्चे का वजन 2.5 से 3.5 किलो ग्राम होता है। बेबी ऑफ राजेश्वरी सिर्फ 440 ग्राम थी, जो आज बढ़कर 1.05 किलोग्राम हो गया है।

बीजापुर के डॉक्टरों की टीम-

सीएमएचओ डॉ. बुधराम पुजारी, डॉ. लोकेश, डॉ. विवेक, डॉ. ज्योतिष, डॉ. विकास, डॉ. हर्ष, डॉ. अजय और डॉ. प्रशांत। स्टॉफ नर्स रोशनी यादव, नेहा, मधु, उर्वशी, अनपूर्णा, अंशुमाला और ललिता। एम्स से शिशुरोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अतुल जिंदल रोजाना वीडियो कांफ्रेसिंग से अपडेट लेते हैं। दवाएं प्रिस्क्राइव करते हैं। सीएचसी के स्टॉफ को गाइड करते हैं। यूनिसेफ के डॉक्टर गजेंद्र सिंह, डॉ. रामकुमार राव और राज्य स्वास्थ्य विभाग के टीकाकारण अधिकारी डॉ. अमर सिंह ठाकुर भी इसकी मॉनीटरिंग कर रहे हैं। डॉ. अतुल जिंदल, एसोसिएट प्रोफेसर, एम्स रायपुर ने बताया कि मैंने इंटरनेट के माध्यम से और डॉक्टरों के बीच जितनी भी जानकारी जुटाई है, यह सबसे कम दिन में जन्मा ऐसा ब"ाा है जो जीवित है। हम तो रायपुर से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन असली श्रेय बीजापुर के डॉक्टर व स्टॉफ को जाता है। जिन्होंने सीमित संसाधनों में सुरक्षित प्रसव करवाया। अभी काफी इंवेस्टीगेशन बचा हुआ है।