
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. कमल प्रीत सिंह से खास बातचीत ( Photo - Patrika )
Patrika Interview: राहुल जैन.स्कूल शिक्षा विभाग के नए सत्र की शुरुआत नए नवाचारों के साथ हो गई है। इसके बाद भी स्कूलों में परंपरागत खामियां देखने को मिल रही हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मंशा के अनुरूप शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना भी विभाग के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे में हाल में स्कूल शिक्षा सचिव बने डाॅ. कमल प्रीत सिंह ने पत्रिका से विभाग की उपलिब्धयों और चुनौतियों से जुड़े विषयों में विस्तार से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के अंश..
जवाब: शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा लक्ष्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। (Chhattisgarh News) उदाहरण के लिए, यदि बच्चा पांचवीं कक्षा में है तो उसे वर्णमाला, गिनती, पहाड़े, गुणा-भाग जैसे मूलभूत कौशल आने चाहिए। लेकिन अभी बड़ी संख्या में ऐसे छात्र हैं जो उच्च कक्षाओं में पहुंचने के बाद भी बुनियादी चीजों में कमजोर हैं। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा चैलेंज यही है। अब इस व्यवस्था को सुधारने के लिए कई इनपुट देने पड़ेंगे।
शिक्षक और छात्र दोनों स्कूल में पर्याप्त समय तक उपस्थित रहें। पूरे वर्ष का स्कूल कैलेंडर हो कि कब कौन-सा सिलेबस पूरा किया जाएगा, खेलों का आयोजन कब होगा, क्योंकि सर्वांगीण विकास भी जरूरी है। इसलिए विभाग तीन बिंदुओं पर ज्यादा फोकस कर रहा है। पहला समय पर स्कूल खोलने, दूसरा शिक्षक और छात्र दोनों की उपस्थिति और तीसरा पूरे वर्ष की अकादमिक गतिविधियों का कैलेंडर। जब ये सारी चीजें समय पर होंगी, तब हम उम्मीद कर सकते हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।
जवाब: अब प्रत्येक छात्र की व्यक्तिगत मॉनिटरिंग की व्यवस्था है। हर विद्यार्थी को एक अपार आईडी दी जाती है। इससे उसकी शैक्षणिक यात्रा ट्रैक की जा सकती है। यदि कोई छात्र एक कक्षा से अगली कक्षा में प्रवेश नहीं लेता, तो सिस्टम अलर्ट देगा। ऐसे छात्रों की पहचान कर हम कारणों का पता लगाएंगे। ड्रॉपआउट के कई कारण होते हैं जैसे आर्थिक स्थिति, कमजोर शैक्षणिक आधार या पारिवारिक परिस्थितियां।
इसके लिए रेमेडियल कोचिंग और ओपन स्कूल जैसे विकल्पों पर काम किया जा रहा है। इस साल सरगुजा जिले में ड्रॉपआउट छात्रों के लिए एक विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया जा रहा है। नेशनल ओपन स्कूल के साथ मिलकर काम होगा। हमारा प्रयास यही रहेगा कि छात्रवार ट्रैकिंग हो, पालकों को संवेदनशील बनाया जाए कि वे बच्चों की पढ़ाई जारी रखें। जिन बच्चों को पढ़ाई में कठिनाई है, उन्हें रेमेडियल कोचिंग देकर नियमित कक्षाओं में वापस लाया जाए।
जवाब: बस्तर और सरगुजा की चुनौतियां अलग हैं। बस्तर में नक्सल प्रभाव के कारण कई स्कूल बंद हो गए थे, जिन्हें अब फिर से मूल स्थानों पर शुरू किया जा रहा है। कई नए स्कूल और छात्रावास आधारित संस्थान भी शुरू किए जाएंगे। इसके अलावा, हल्बी-हिंदी और गोंडी-हिंदी द्विभाषी पुस्तकों पर काम हो रहा है, ताकि स्थानीय भाषा में पढ़ाई आसान हो सके। सरगुजा में मुख्य चुनौती दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षकों की उपलब्धता है। वहां शिक्षक उपलब्ध कराने और एकल शिक्षक वाले स्कूलों की समस्या खत्म करने पर फोकस है।
प्रश्न: गणवेश, किताबें और साइकिल वितरण में अक्सर देरी होती है। इसमें सुधार कैसे होगा?
जवाब: इस बार पिछले वर्षों की तुलना में काम पहले शुरू किया गया है। लगभग 60 फीसदी से अधिक गणवेश उपलब्ध कराए जा चुके हैं और शेष भी जल्द उपलब्ध हो जाएंगे। यानी एक सेट दिया जा चुका है और दूसरा सेट भी 7 जुलाई तक दे दिया जाएगा। पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति भी पहले की तुलना में 1 से 1.5 महीने पहले हो रही है।
हम हाईस्कूल तक की किताबों की आपूर्ति काफी हद तक पूरी कर चुके हैं। बाकी विषयों की किताबें भी 23 जुलाई तक शासकीय स्कूलों में उपलब्ध हो जाएंगी। साइकिल वितरण में भी तेजी लाई गई है। हमारी कोशिश है कि आगामी वर्षों में 1 अप्रैल से ही सभी सामग्री छात्रों को उपलब्ध हो जाए।
जवाब: सबसे बड़ा फोकस उपस्थिति सुनिश्चित करना है। शिक्षकों सहित पूरे विभाग को ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली से जोड़ा जा रहा है। लगभग 1.2 लाख शिक्षक पहले ही ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हमारा लक्ष्य 100 फीसदी उपिस्थति का है। इसके अलावा, सेवा संबंधी कार्य, प्रमोशन, अवकाश और मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाओं को भी ऑनलाइन किया जा रहा है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और लंबित मामलों में कमी आएगी।
शिक्षकों के लिए जैसे प्रमोशन, अवकाश और अन्य प्रशासनिक कार्य इन सबके लिए ई-एचआरएमएस लागू किया गया है। इसे अनिवार्य बनाया जा रहा है। अवकाश हो या अन्य कोई विषय, सब कुछ ऑनलाइन होगा। क्योंकि कागज़ी व्यवस्था से 2 लाख कर्मचारियों का प्रबंधन प्रभावी ढंग से संभव नहीं है। हमारे विभाग में लगभग 15,000 न्यायालयीन प्रकरण हैं। इनका एक बड़ा कारण मैनुअल व्यवस्था भी है। इसलिए आगे प्रयास रहेगा कि एसीआर और अन्य मूल्यांकन प्रक्रियाएं भी पूरी तरह ऑनलाइन हों।
जवाब: एआई तेजी से विकसित हो रहा है। फिलहाल इसे शिक्षा में सावधानी के साथ अपनाने की जरूरत है। पढ़ाई और टेस्टिंग में इसका उपयोग संभावनाओं से भरा है, लेकिन अभी कोई स्थिर मॉडल सामने नहीं आया है। पहले हम इसे शिक्षक प्रशिक्षण और सीमित प्रयोगों में इस्तेमाल करेंगे। यदि यह बच्चों के सीखने में प्रभावी साबित होता है, तो आगे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।
जवाब: 2030 या उससे पहले जो भी स्थिति हो, सबसे पहला लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है। यह एक व्यापक लक्ष्य है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जो पढ़ाया जा रहा है, उसकी प्रभावशीलता लगातार जांची जाए। हमें नियमित रूप से छात्रों का मूल्यांकन करना होगा और देखना होगा कि पढ़ाई का असर वास्तव में कितना हो रहा है। तीसरा, इन सभी कार्यों को प्रभावी बनाने के लिए अधोसंरचना को मजबूत करना होगा।
उदाहरण के लिए, यदि किसी स्कूल में स्मार्ट क्लास है, स्मार्ट क्लास मॉनिटर है, तो ऐसी स्थिति में भले ही स्थानीय शिक्षक की प्रस्तुति क्षमता सीमित हो, फिर भी तकनीक की मदद से बेहतर शिक्षण संभव है। एक और बड़ा फोकस मॉडल स्कूलों के विकास पर है। हमारी कोशिश होगी कि आने वाले वर्षों में सभी स्कूलों का स्तर पीएम श्री और स्वामी विवेकानंद मॉडल स्कूलों जैसा हो जाए।
जवाब: अब प्रत्येक छात्र की व्यक्तिगत मॉनिटरिंग की व्यवस्था है। हर विद्यार्थी को एक अपार आईडी दी जाती है। इससे उसकी शैक्षणिक यात्रा ट्रैक की जा सकती है। यदि कोई छात्र एक कक्षा से अगली कक्षा में प्रवेश नहीं लेता, तो सिस्टम अलर्ट देगा। ऐसे छात्रों की पहचान कर हम कारणों का पता लगाएंगे। ड्रॉपआउट के कई कारण होते हैं जैसे आर्थिक स्थिति, कमजोर शैक्षणिक आधार या पारिवारिक परिस्थितियां।
इसके लिए रेमेडियल कोचिंग और ओपन स्कूल जैसे विकल्पों पर काम किया जा रहा है। इस साल सरगुजा जिले में ड्रॉपआउट छात्रों के लिए एक विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया जा रहा है। नेशनल ओपन स्कूल के साथ मिलकर काम होगा। हमारा प्रयास यही रहेगा कि छात्रवार ट्रैकिंग हो, पालकों को संवेदनशील बनाया जाए कि वे बच्चों की पढ़ाई जारी रखें। जिन बच्चों को पढ़ाई में कठिनाई है, उन्हें रेमेडियल कोचिंग देकर नियमित कक्षाओं में वापस लाया जाए।
Updated on:
25 Jun 2026 11:55 am
Published on:
25 Jun 2026 11:54 am
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