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मां ने लकड़ी बेचकर बेटे को बनाया राष्ट्रीय खिलाड़ी, गेम के दौरान पड़ी इंडियन नेवी कोच की नजर तो बदल गई किस्मत

अतिश पटेल ने वेटलिफ्टिंग (Weightlifting) में कई पदक जीते और मां के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा आगे रहे। मंगलोर में हुए सीनियर नेशनल में कांस्य पदक (bronze medal ) जीतने के बाद रायपुर के इस खिलाड़ी पर भारतीय नौ-सेना (Indian nevy) के कोच की नजर पड़ी।

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Atish Patel

मां ने लकड़ी बेचकर बेटे को बनाया राष्ट्रीय खिलाड़ी, गेम के दौरान पड़ी इंडियन नेवी कोच की नजर तो बदल गई किस्मत

अजय रघुवंशी@रायपुर. ये कहानी उस मां और बेटे की है, जिसने परिस्थितियों से हार नहीं मानी, बल्कि गरीबी और तंगी से जूझते हुए राज्य का नाम रोशन किया। मां को बेटे के खेल के लिए कभी मजदूरी करनी पड़ी तो कभी लकड़ी बेचकर गुजारा किया। वहीं बेटे को मां की तकलीफ कम करने के लिए कभी किराना दुकान में काम करना पड़ा, तो कभी नौकरी की तलाश में भटकना पड़ा। लेकिन कहते हैं ना मेहनत का फल जाया नहीं जाता और वह दिन भी आया जब मां और बेटे के जीवन में खुशियां बहार बनकर आई।

सतनामी पारा, गुढिय़ारी के अतिश पटेल ने वेटलिफ्टिंग में कई पदक जीते और मां के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा आगे रहे। अब वह दिन भी आया जब अतिश के सपनों को उड़ान मिली। मंगलोर में हुए सीनियर नेशनल में कांस्य पदक जीतने के बाद रायपुर के इस खिलाड़ी पर भारतीय नौ-सेना के कोच की नजर पड़ी। अतिश की जीवटता और मेहनत को देखते हुए चयनकर्ताओं ने उन्हें नौ सेना के टैंलेंट कोटा में शामिल होने का ऑफर दिया।

भारतीय नौ-सेना के हिस्सा बनने की खबर सुनते ही परिवार में खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। वह दिन भी याद आया जब लकड़ी बेचकर अतिश के खेलने के लिए रुपयों और रोटी का प्रबंध किया था। पिता की मृत्यु के बाद मां के लिए अतिश ही उनका पूरा जीवन है। इस उपलब्धि के बाद मां की खुशियों का ठिकाना नहीं है। सलेक्शन के बाद अब अतिश देश के लिए मैडल जीतने की इच्छा रखता है। वर्तमान वह भारतीय नौ-सेना के ओडि़शा स्थित ट्रेनिंग सेंटर में ट्रेनिंग ले रहा है।

अतिश ने 14 साल की उम्र से लोहा उठाना शुरू किया। जिस मोहल्ले में अतिश का घर है, वहीं से चंद कदमों की दूरी पर अंतराष्ट्रीय वेटलिफ्टर रूस्तम सारंग व अजयदीप सारंग का भी निवास है। दोनों खिलाडिय़ों ने अतिश को आगे बढऩे में काफी मदद की। रूस्तम व अजय के पिता व वेटलिफ्टिंग कोच बुधराम सारंग ने भी अतिश को लंबे समय से ट्रेनिंग दी है। अतिश की कई जरूरतों के लिए सारंग परिवार ने बड़ी भूमिका निभाई। उपलब्धि पर रूस्तम व अजयदीप ने कहा कि ये अतिश का हुनर है कि आज वह इस मुकाम पर हैं। वह दिन दूर नहीं जब रायपुर का यह लाल देश के लिए मैडल जीतेगा।

वर्ष 2018 में कर्नाटक के मंगलोर में आयोजित हुए सीनियर नेशनल में कांस्य पदक ने अतिश की किस्मत बदल दी। 69 किग्रा. वजन वर्ग में 156 किग्रा. वजन उठाकर तीसरे स्थान पर रहे। इसके साथ ही अतिश ने नेशनल गेम के लिए भी क्वालीफाई कर लिया।

एक बेहतर वेवेटलिफ्टिंग खिलाड़ी बनने और राष्ट्रीय स्तर पर मुकाम बनाने के लिए महीने भर में कम से कम 15 हजार रुपए का खर्च हैं, लेकिन अतिश को डाइट मनी के लिए काफी परेशान होना पड़ा। परिवार की कमजोर आय और गरीबी के चलते अतिश ने जो मिला उसी में गुजारा किया। अजय और रूस्तम की मदद से जिम में मेहनत की और डाइट मनी के लिए सहयोग मिला। 3000 रुपए की डाइट मनी से अतिश ने हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए शरीर का लोहा बना लिया। देश के बड़े खिलाडिय़ों को पछाड़ दिया, जो कि अपने खान-पान पर महीने में हजारों रुपए खर्च करते हैं।

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