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जनसेवा और वादे को छोड़ राजनीति करने का जमाना!

जनता की सेवा करने की बजाय उन पर शासन करने का चल रहा दस्तूर

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जनसेवा और वादे को छोड़ राजनीति करने का जमाना!

राजनीति जनसेवा के लिए होती है। लोकतंत्र में न कोई बड़ा होता है न कोई छोटा। सभी का समान अधिकार होता है। लेकिन जो लोग सत्ता में होते हैं उन्हें कुछ ज्यादा अधिकार मिले होते हैं, ताकि वे अपनी जिम्मेदारी निभा सके। लोगों की सेवा कर सके। जनप्रतिनिधि हो या फिर सरकार के नुमाइंदे यदि अपने अधिकारों का निर्वहन देशहित व जनसेवा के लिए करते हैं तो उन्हें 'विशिष्टÓ मानने, कहने, समझने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन कोई यदि सोचे कि 'मैं नेता हूं, जनप्रतिनिधि हूं, मंत्री हूं, जो चाहूंगा वो करूंगा। मैं जनता के लिए नहीं, बल्कि जनता मेरे लिए है। मैं बड़ा हूं, न कि जनता। मेरे पास अधिकार है, पॉवर है, कुर्सी है, पद है। मुझे 'विशिष्टÓ माना जाएÓ तो अहंकार की यह भावना, सोच व दृष्टि लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर व खतरनाक है।
लोकतंत्र में सरकार के संचालन के लिए लोग अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। उन्हें 'विशिष्टÓ मानते हुए मान-सम्मान देते हैं, आदर करते हैं। लेकिन जनता के प्रतिनिधि हों या फिर सरकार के नुमाइंदे, जनता के सम्मान को अपना सिद्ध अधिकार मान बैठते हैं। जनता की सेवा करने के बजाय उन पर शासन करने लगते हैं। देश में वर्षों से यही दस्तूर चला आ रहा है। आज तो देशभर में चहुंओर यही हालात हैं।
अहंकारी नेताओं से कैसे निपटना है, यह देश की जनता अच्छी तरह से जानती हैं। नेताओं को चुनाव में हराने और सत्ता सेेउतारने का करिश्मा जनता कई बार कर चुकी है। जब तक अहंकारी लोग प्रतिनिधित्व व शासन करते रहेंगे, तब तक भारतीय लोकतंत्र में सत्ता बदलने का कारनामा होना अवश्वंभावी है।
कोई पार्टी ढेरों वादे करके सत्ता पर काबिज होती है। कोई नेता कई तरह के प्रलोभन, आश्वासन, घोषणा, तिकड़म कर चुनाव जीतता है। इसके लिए खूब मेहनत करते हैं। घर-घर, गली-गली, गांव-गांव, शहर-शहर की धूल फांकते हैं। मतदाताओं के हाथ जोड़ते हैं, पांव पकड़ते हैं। लेकिन वह वादे पूरे करके, ईमानदारी के मार्ग पर चलकर अपनी जिम्मेदारी निभाने, जनसेवा करने से परहेज करता हैं या फिर उन्हें इन सब पर विश्वास ही नहीं होता है। यानी गलत रास्ते को ही सही मान लिया गया है! वादाखिलाफी करने को जायज मान लेना या फिर वादों को जुमला करार देना लोकतंत्र के हित में नहीं है। लोकतंत्र के कमजोर होने के लिए इसी प्रकार की सोच व विचारधारा जिम्मेदार है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए ऐसे जनप्रतिनिधि होना चाहिए जो जनसेवा को ही अपना धर्म, कर्म और कर्तव्य समझे और झूठे वादे पर निर्भर न हो। मतदाता भी ऐसे जनप्रतिनिधि को चुनें जो ईमानदार, जनसेवक, सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, भाईचारे के मार्ग पर चलने वाले हों।
राजनीति का मतलब है जनता की सेवा। वादाखिलाफी, शोषण करना और पैसे कमाना नहीं है। लेकिन आज ऐसा नहीं हो रहा है। क्योंकि, ज्यादातर राजनेताओं का ध्येय तो सिर्फ स्वार्थ साधने के लिए राजनीति करना रह गया है। सच बात तो यह है कि ईमानदारी कोई सिस्टम नहीं है, यह तो एक व्यक्तिगत आचरण है। जो एक पूरे सिस्टम को प्रभावित करता है। सौ बात की एक बात यह कि इस घोर कलयुग में लोग ईमानदारी से भी काम कर सकते हैं।