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जब देशभर के सारे स्कूल, कॉलेजों और कार्यालयों में सन्नाटा रहता है, तो इस पाठशाला में बच्चों की आवाज गूंजती है,,,कहां है यह पाठशाला ?

राजधानी में तिल्दा विकासखंड के भरवाडीह कला का शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय जो एक एकड़ से कम क्षेत्र में बना एक ऐसा भी स्कूल है जो 365 दिन में से एक दिन भी बंद हो जाए तो बच्चे मायूस हो जाते है।

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जब देशभर के सारे स्कूल, कॉलेजों और कार्यालयों में सन्नाटा रहता है, तो इस पाठशाला में बच्चों की आवाज गूंजती है,,,कहां है यह पाठशाला ?

जब देशभर के सारे स्कूल, कॉलेजों और कार्यालयों में सन्नाटा रहता है, तो इस पाठशाला में बच्चों की आवाज गूंजती है,,,कहां है यह पाठशाला ?

रायपुर। स्कूल की छुट्टी होते ही बच्चों की ऐसी चिल्लाहाट सुनाई पड़ती है मानों उन्हें सारे जहां की खुशी मिल गई हो, लेकिन राजधानी में तिल्दा विकासखंड के भरवाडीह कला का शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय जो एक एकड़ से कम क्षेत्र में बना एक ऐसा भी स्कूल है जो 365 दिन में से एक दिन भी बंद हो जाए तो बच्चे मायूस हो जाते है। जब देशभर के सारे स्कूल, कॉलेजों और कार्यालयों में सन्नाटा रहता है, तो इस पाठशाला में बच्चों की आवाज गूंजती है। एक हजार की आबादी वाले इस गांव की पाठशाला में 51 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल में 6 वीं से 8 वीं तक ही कक्षाएं लगती है।

प्रधान पाठक बने स्कूल के रचियता
बच्चो का स्कूल के प्रति इतना लगाव यूं ही नहीं हुआ, स्कूल की इस काया के रचियता है इसी स्कूल के प्रधान पाठक दीपक वर्मा। इन्होंने 3 साल में जंगली पेड़-पौधों से घिरे हुए तीन कमरों को एक सुंदर सा हरा-भरा स्कूल बना दिया। और इतना ही नहीं इस स्कूल की सुरक्षा का जिम्मा गांव वालों ने ले लिया है। यदि स्कूल में कुछ भी नुकसान होता है या कोई स्कूल के बंद होने पर इसमें प्रवेश करता है तो उस पर 5 हजार एक का दंड लगता है। दीपक वर्मा ने इस स्कूल को इतना अनुशासित बना दिया कि अब गांव में भी अनुशासित हो रहा है।

पूरे प्रदेश में है इस स्कूल की चर्चा
पूरे प्रदेश में चर्चा में रहने वाला यह स्कूल यूं ही खास नहीं है बल्कि इसकी खासियत यह सोचने पर विवश करती है कि आज के दौर में एक ऐसा भी शिक्षक हो सकता है जिसने घने जंगल को संवार कर बगीचा बना दिया और इस बगीचे में कई फूल खिला दिए। सबसे बड़ी बात इस स्कूल की यह है कि यहां बच्चे खुद से सारा काम करते है। रविवार को स्कूल खोलने और बंद करने से लेकर स्कूल के पौधों को पानी और मिट्टी डालने का काम यहीं बच्चे करते है बैठने के लिए घास का मैदान भी बना है जिसकी सफाई भी बच्चे ही करते है।

बच्चे रविवार को बागवानी करने आते है
स्कूल में रविवार को आने के साथ ही बागवानी का काम करने के विषय में जब बच्चों से बात की गई तो बच्चों ने कहा कि हमारी पाठशाला ही हमारा घर है और इस घर में यदि हम एक दिन भी नहीं आए तो हमें लगता है जैसे कुछ गलत हो गयाहै। पौधों से हमें इतना लगाव हो गया कि हमें लगता है कि हम एक गिन नहीं जाएंगे तो नि पौधों को पानी कौन देगा।राजधानी रायपुर के तिल्दा विकासखंड स्थित इस गांव का शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय रविवार को तो खुलता है। साथ ही दिवाली, होली, रक्षाबंधन, ईद, बैसाखी और क्रिसमस के दिन भी स्कूल की घंटी बजती है। इस गांव के लोगों की
शिक्षा के प्रति गहरी समझ के कारण ही एक शिक्षा के पुजारी को अपनी मेहनत का फल मिला और तीन साल में इस स्कूल की सूरत और सीरत बदल गई।

....ऐसे शुरू हुआ सिलसिला शिक्षक दीपक वर्मा बताते हैं, कि वे 2015 में जब इस स्कूल में आए तो यहां पर चारों और बड़ी-बड़ी झाडिय़ा और पेड़ लगे हुए थे चार कमरे बने हुए थे लेकिन इन कमरों में बच्चों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। सबसे पहले तो उन्होंने शिक्षा प्रबंधन समिति और गांव में ही काम करने वाली स्वसहायता समूह की महिलाओं से सहयोग लिया और स्कूल के परिसर को साफ किया, क्यारियां बनवाई उनमें पौधे लगवाएं। बैंच की व्यवस्था करवाई।

किसी तरह स्कूल शुरू हो गया बच्चे भी आने लगे लेकिन शिक्षकों की कमी थी क्योंकि स्कूल में तीन कक्षाओं के लिए 2 ही शिक्षक थे, जबकि स्कूल में चार शिक्षकों के पद स्वीकृत थे, लेकिन दो ही शिक्षक तीन कक्षाओं के लिए मिले थे। उन्होंने बताया कि छह विषयों को पढ़ाने के लिए दो शिक्षक ही थे इस कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। तब दिनेश कुमार वर्मा ने गांव के सरपंच के समक्ष प्रस्ताव रखा कि अगर गांव वाले चाहें तो इस पाठशाला को हम रोज खोल सकते हैं, लेकिन इसके लिए हमें गांववालों का सहयोग चाहिए गांव वालों ने सहमति दी और शिक्षक दिनेश ने हर दिन विद्यालय आने की जिम्मेदारी ले ली और गांव वालों ने एक व्यक्ति को वहां पढाऩे के लिए नियुक्त कर दिया। इसकी तनख्वाह शाला प्रबंधन समिति के 15 सदस्य और ग्राम पंचायत दोनों मिलकर देते है।

स्कूल में 2 कंप्यूटर और एक टीवी लगवाई

दीपक वर्मा ने स्कूल में अपने खर्चे से दो कंप्यूटर और ेक टीवी की व्यवस्था की। एक कंप्यूटर ग्राम पंचायत ने दिया। जिस शिक्षक को उन्होंने गांववालों के सहयोग से लिया था वो शिक्षक अब बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देने के साथ ही सारी व्यवस्था देखते है। प्रधान पाठक खरोरा में रहते है और वे 12 किलोमीटर की दूरी तय कर रोज विद्यालय पहुंचते हैं। जिस दिन किसी कारणवश वे विद्यालय नहीं आते, तब गांव के किसी शिक्षित व्यक्ति को यह जिम्मेदारी दी जाती है। रविवार व त्योहार के दिन भी बच्चों की कक्षाएं लगाकर उनके प्रभावित पाठ्यक्रम को पूरा किया जाता है।

बच्चे आत्मनिर्भरता के गुर सीख रहे

विद्यालय में बच्चों को स्वावलंबी बनाया जा रहा है और इसके लिए शिक्षकों के साथ ही पूरे गांव का सहयोग मिल रहा है। गांव के बुजुर्ग बच्चों को खेती-बाड़ी सिखाते हैं। रविवार को सामान्य ज्ञान के साथ ही खेती करना सीखने के साथ ही बच्चे पौधों की भी क्यारियां ठीक करते है। घास की सफाई करते है। अपने स्कूल को खुद ही साफ करते है। स्कूल परिसर में बनाए खेत में बच्चों ने कई सारी फसले लगाई है और उन्हें काटने से लेकर सुखाने और भंडार करने की भी सारी बारीकियां गांव के बुजुर्ग सिखाते है।

विद्यालय में शिक्षकों ने अपने वेतन से रकम जुटाकर बच्चों के लिए वाद्ययंत्र खरीदे हैं। बच्चों को ढोल, तबला, मादर, हारमोनियम, बैंड बजाना सिखाया जाता है। खेलने के लिए वॉलीबॉल, बैडमिंटन और किक्रेट के साजोसामान भी उन्हें यहीं मिल जाते हैं।
दीपावली पर स्कूल में भी सब मिलकर दीप जलाते हैं। स्कूल को साफ- सुथरा कर रंगोली बनाते हैं। स्कूल में ही बच्चे पटाखे फोड़ते हैं। पाठशाला मानो अब बच्चों का घर बन चुकी है। सरपंच तुकेश्वरी बंजारे के अनुसार, इसमें गांव वालों को कोई आपत्ति नहीं है। यहां अवकाश न रखकर हम बच्चों के विकास के लिए सहमत हैं।


किचन गार्डन में कई सब्जियां लगी है
स्कूल में बने किचन गार्डन में कई सारी सब्जियां लगी है। यहां लगी सब्जियों में रखिया भी बहुत हुआ है जिसकी बड़ी बनाई गई है। स्कूल की रसोई में ही यहां की सब्जियों का इस्तेमाल होता है। शुद्ध हवा और पौष्टिक सब्जियों के साथ पर्यावरण के प्रति लगाव पैदा करता यह स्कूल नौनिहालों के भविष्य को संवार कर नई राहे बना रहा है। यहां जो रसोई बनाती है वहीं बच्चों को मितानिन की भूमिका में भी स्वास्थ्य की सीख देती है। खास कर बढ़ती बच्चियों को उम्र बढऩे के साथ होने वाले परिवर्तनों की जानकारी देती है। बच्चों को सेहतमंद रहने के तरीके बताती है।

अब तो काम करने में मजा आता है
हम लोगों को यह स्कूल अपना सा लगता है यहां के सारे बच्चे हमारे अपने है इस कारण हमें एक साथ कई काम करने में मजा आता है। इन बच्चों के लिए रसोई बनाते समय भी यहीं भाव रहता है इस कारण बच्चे यहां बना खाना भी बहुत चाव से खाते है। 3 साल पहले इस स्कूल में कोई आना पसंद नहीं करता ता लेकिन अब यह स्कूल तो प्राइवेट स्कूलों को भी मात दे रहा है। स्कूल के प्रधान पाठक की इस लगन ने ही हमें भी इन बच्चों के लिए कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया और आज परिणाम सामने दिक रहा है। बच्चे हर रोज स्कूल आना चाहते है।

कुंती विश्वकर्मा, प्रगति महिला स्वसहायता समूह

सोच बदलनी होगी तभी सारे स्कूल बदल पाएंगे

मुझे इन बच्चों के लिए कुछ अच्छा करने में खुशी मिलती है और संतोष सा महसूस होता है। एक अच्छी सोच होगी तभी हम बदलाव कर सकते है। मैेंने बस इस स्कूल को अपना माना, इसे अपना घर समझा और इन बच्चों के लिए काम करना मेरी पूजा है। इसलिए शायद में इस स्कूल की सूरत और सीरत को बदल पाया हूं। लोग तो सारे अच्छे होते है। अपनी इच्छा शक्ति को इतना मजबूत कि हर चीज संभव हो जाए। हर शिक्षक को अपने अंदर ऐसी सोच पैदा करना पड़ेगा कि यह मेरा विद्यालय है यह मेरा घर, मेरा मंदिर है जब यह सोच रहेगी तभी समर्पण का भाव रहेगा। मेरे विद्यालय को भी में अपना समझ्ंाूगा तभी में उसे संवार सकूंगा।
दीपक वर्मा, प्रधान पाठक भरूवाडीह कला स्कूल

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