
World Autism Awareness Day: पूरी दुनिया में ऑटिज्म से बच्चों पर खतरा
भारत समेत पूरी दुनिया में ऑटिज्म से पीडि़त बच्चों और वयस्कों की संख्या काफी है। 2017 में भारत में 10 लाख लोग ऑटिज्म से प्रभावित थे। देश में हर 68 में से एक बच्चा इस बीमारी से ग्रसित है। वहीं, पूरी दुनिया में 20 व्यक्ति इससे प्रभावित होते हैं प्रति दस हजार लोगों में। हालांकि 20 फीसदी ऑटिज्म के मामलों के लिए आनुवांशिक कारण जिम्मेदार होते हैं, लेकिन 80 फीसदी मामलों के लिए पर्यावरण वंशानुगत कारण जिम्मेदार होते हैं। पूरी दुनिया में 2 अप्रैल (शुक्रवार) को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में 2 अप्रैल को विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की थी।
अमेरिका में तेजी से बढ़ रहे मामले
जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने रोग नियंत्रण और रोकथाम रिपोर्ट बताया है कि यह रोग देश में तेजी से बढ़ रहा है। साल 2016 में 8 वर्ष की आयु के बच्चों में 54 में से एक बच्चे ऑटिज्म से ग्रसित पाए गए। यह रोग दो साल पहले की तुलना में 10 फीसदी तक बढ़ गया है। पहले यह अनुपात 59:1 था। लड़कियों की तुलना लड़के इस रोग से ज्यादा ग्रसित होते हैं।
ऑटिज्म क्या है
विशेषज्ञों के मुताबिक ऑटिज्म एक मानसिक रोग है। बच्चे इस रोग के अधिक शिकार होते हैं। एक बार ऑटिज्म के चपेट के आने के बाद बच्चे का मानसिक संतुलन संकुचित हो जाता है। इस कारण बच्चा परिवार और समाज से दूर रहने लगता है। इसका दुष्प्रभाव बड़े लोगों में अधिक देखने को मिलता है।
ऑटिज्म के लक्षण
12 से 13 माह के बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण नजर आने लगते हैं।
इस विकार में व्यक्ति या बच्चा आंख मिलाने से कतराता है।
किसी दूसरे व्यक्ति की बात को न सुनने का बहाना करता है।
आवाज देने पर भी कोई जवाब नहीं देता है। अव्यवहारिक रूप से जवाब देता है।
माता-पिता की बात पर सहमति नहीं जताता है।
आपके बच्चे में इस प्रकार के लक्ष्ण हैं, तो आपको डॉक्टर से परामर्श लें।
सावधानियां
आप अपने बच्चे के एक्टिविटी में बदलाव लाने की कोशिश करें।
उसके खानपान, रहन-सहन और जीवनशैली पर अधिक ध्यान दें।
अपने बच्चे को संकुचित न होने दें। उसे रोजाना नए लोगों से परिचय कराएं।
इसके बाद लगातार काउंसलिंग से बच्चे की सेहत में अवश्य सुधार देखने को मिल सकता है।
ऑटिज्म होने का कारण
वास्तव में ये रोग क्यों होता है इस बारे में अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं है। यह दिमाग के कुछ हिस्सों में हो रही समस्याओं के कारण होता है। लड़कियों की तुलना में लड़कों में ऑटिज्म का खतरा चार गुना अधिक होता है। कई बार यह जैनेटिक होता है। बुजुर्ग माता-पिता के कारण इसका बच्चों पर ऑटिज्म का प्रभाव अधिक होता है।
इलाज
इसका कोई सटीक इलाज नहीं है। डॉक्टर्स बच्चों की स्थिति और लक्षण के बाद तय करते है कि क्या इलाज करना है। इसके इलाज में बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी आदि कराए जाते है, जिससे बच्चों को उन्हीं की भाषा में समझा जा सके। इस थेरेपी से बच्चे काफी हद तक सही हो जाते हैं। जिसके कारण वह अजीब हरकतें को करना कम कर देते हैं। दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने लगते हैं। इस थेरेपी में डॉक्टर के साथ-साथ माता-पिता का विशेष हाथ होता है। उन्हें अपने बच्चे का खास ध्यान रखना पड़ता है।
ऐसे पता लगाएं
आम तौर पर एक बाल-रोग विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ दल व्यक्ति का अवलोकन करता है और उसके माता-पिता से तथा कभी-कभार अध्यापकों से बातचीत करता है। वे लोग बच्चों को कुछ करने के लिए भी कह सकते हैं ताकि वे देख सकें कि वे सीखते कैसे हैं। पेशेवर व्यक्ति कुछ साधनों और निर्धारणों के द्वारा बच्चे की कुछ मानदंडों के अनुरूप होने की जांच करते हैं और वे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की पहचान कर सकते हैं।
Published on:
02 Apr 2021 07:40 pm

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