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राजसमंद के इतिहास पुरुष महाराणा राजसिंह

मेवाड़ के अकाल की विभीषिका का जवाब उन्होंने गोमती के जल को बांधकर दिया तो निरंतर तीन वर्ष तक नदी के प्रवाह में टूट जाने वाली पाल को उन्होंने पुनर्निर्मित भी कराया।

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Patrika @ Rajsamand राणा राजसिंह जयंती के प्रसंग में राजसमंद शहर के अतीत को खंगालना अनेक उतार-चढ़ावों से भरे यहां के इतिहास के सूने गलियारों में घूमने जैसा अनुभव देगा।
एक आकार लेते और महानगर की दिशा में अंगड़ाइयां लेते शहर के इतिहास की ओर एक दृष्टिपात करें तो ज्ञात होगा कि यह शहर अपने उठान के युग से राज्य, धर्म और लोकशक्ति के सामंजस्य से बने शारीरिक और मानसिक ढांचे का शहर रहा है। शिक्षा, साहित्य, कला और समग्र रूप से यहां के निवासियों का व्यक्तित्वगत शिल्प सदैव दो उपादानों की देन है, जिन्हें यहां के निर्माताओं ने विकास के सोच और उसकी क्रियान्विति के लिए चुना। राजसमंद झील और श्री द्वारकाधीश को अलग कर इस शहर की तासीर को समझना बड़ा कठिन काम होगा। दोनों ही मानों किसी देह में बहते रक्त के प्रवाहन वाली धमनी और शिराएं थीं।
इतिहास इस तथ्य को भी सामने रखता है कि इस क्षेत्र के शासकों ने सदैव यहां कृषि और पेयजल की जरूरतों के लिए जल भंडारण को प्राथमिकता दी तो जन-जन को भावनात्मक सूत्र में बांधने के लिए प्रभु विग्रहों को अपनी श्रद्धा का केन्द्र बनाया। ब्रजभूमि का त्यागकर यहां का एक बड़ा जन समुदाय इस उम्मीद के साथ मेवाड़ की आरावली से घिरी सुरक्षित स्थलियों में आया था कि वह सिंहाड़ और आसोटिया के पहाड़, जंगल और जमीन के मध्य कालिंदी कूल कदंब की डाल वाले ब्रज की अनुभूति कर सके। वे राणा राजसिंह ही थे, जो ब्रजवासियों के प्रति अपने कौल या वादे को भूले नहीं। अपने पूर्वजों की ब्रजयात्रा के दौरान गोस्वामी गिरिधरलाल महाराज को महाराणा जगतसिंह को दिया आश्वासन उन्हें याद रहा कि जब भी प्रभु पर कोई संकट आए मेवाड़ की धर्मधरा आप और ब्रजजन की रक्षार्थ हमेशा सन्नद्ध रहेगी। एक प्रजा वत्सल राजा की यह संकल्पबद्धता आने वाले युग में उन्हें एक नगर निर्माता का गुरुतर दायित्व सौंप गई।
निस्संदेह महाराणा राजसिंह अतीत और भविष्य की एक सशक्त योजक श्रृंखला थे। अपने समय के बीहड़ों में बसे सिंहाड़ और आसोटिया जैसे जंगली मजरों में बसे गांव-गुवाड़ों को ब्रज संस्कृति के केन्द्र के रूप में बसाने की जो हरी झंडी महाराणा ने दी, कालांतर में वह मेवाड़ के दो विशाल भक्ति केन्द्र बन गए।
विकास प्रक्रिया में ढांचागत विकास के सूत्र प्रथम बुने जाते हैं और संस्थायी सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के सूत्र बाद में। यह महाराणा राजसिंह का रचना कौशल था कि उनके शासन में इन धार्मिक केन्द्रों के भौतिक विकास के समानान्तर इन पुष्टिमार्गीय केन्द्रों के सांस्कृतिक विकास के लिए भूमिका स्वरूप वातावरण का विकास किया। कालांतर में मंदिरों के विकास में कला, साहित्य,संस्कृति के विकास की जो क्रांति हुई, उसके पीछे उदयपुर के महाराणाओं की प्रेरणाएं सर्वोपरि रहीं। नौचौकी और वहां उत्कीर्ण 'राज प्रशस्ति' ऐतिहासिक और सांस्कृतिक युग का जीवंत दस्तावेज कहा जा सकता है। यही नहीं, मेवाड़ में जगह-जगह स्थापत्य और वास्तुकला के प्रस्तर शिल्प राजसिंह के बहुरंगी व्यक्तित्व के परिचायक हैं। वे कालजयी प्रेरणाओं के उत्स कहे जा सकते हैं।
राणा राजसिंह जनकल्याणकारी योजनाओं के संकल्पकर्ता और समयबद्ध क्रियान्विति के हामी थे। मेवाड़ के अकाल की विभीषिका का जवाब उन्होंने गोमती के जल को बांधकर दिया तो निरंतर तीन वर्ष तक नदी के प्रवाह में टूट जाने वाली पाल को उन्होंने पुनर्निर्मित भी कराया।
इन पंक्तियों के लेखक के अंतस् में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि राजसमंदवासी महाराणा राजसिंह को क्यों याद करें? शायद इसलिए कि वे मेवाड़ की मूल आदिम संस्कृति को ब्रज और दक्षिण भारत के आयातित आध्यात्मिक संस्कारों से जोडऩे वाले दूरगामी सोच सम्पन्न शासक थे। राजसमंद, नाथद्वारा के आभामंडल से समस्त मेवाड़ को सुवासित करने वाले वे प्रशासक थे। पुष्टिमार्ग को जितना प्रसार मेवाड़ में मिला, संभवत: और किसी अंचल में नहीं मिलता। हम उन्हें इसलिये भी याद करें क्योंकि उन्होंने राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर भक्ति मार्ग का बीज वपन कर यहां के शौर्यवान शासकों को संवेदना का पाठ पढ़ाया। हम उन्हें क्यों न याद करें जिनकी सौन्दर्य दृष्टि ने नौचौकी जैसे संगमरमरी पत्थरों पर उत्कीर्ण नक्काशी को हमें उपलब्ध कराया और उस स्वर्गिक सौन्दर्य के साथ आश्चर्यान्वित होने वाले राज प्रशस्ति शिलालेख से हमें परिचित कराया।
प्रकृति की अप्रतिम देन राजसमंद झील के शिल्पकार राणा राजसिंह को स्मरण रखने के और भी कारण होंगे। मेरे लिए तो वैशाख शुक्ल 13 वि.सं. 1726 का वह महनीय पल कल्पना में बांधने योग्य है, जब कांकरोली में गोमती नदी में सेतु बंधन का मुहूर्त किया गया होगा। जब श्रमिक शिल्पकारों ने नींव की खुदाई कर चूने से परिवेष्टित महाशिलाओं को इस तरह स्थापित किया होगा कि नींव पैरों से लेकर ऊध्र्व तक भर जाए।

'पूर्णे शते सप्तदशेथ वर्षे चकार
षड्विंशतिनाम्नि राधे
सितत्रयोदश्यभिदेह्नि
सेतोर्नृपो मुहूर्तं कांकरोल्याम्
ततोत्र खातो रचित: पृथिव्यां
जनैर्विचित्रै: पृथुवि: खनित्रै:
महाशिलाभि: ससुधाभराधि:
सेतो: पदंपूरितमेव तुंगम्Ó

आइए, लोकमंगलकारी प्रकृति के मेवाड़ नरेश महाराणा राजसिंह को राजसमंद के अवदान के लिए याद करें। अवश्य ही यह अवदान आबाल युवा पीढ़ी को अपने महिमाशील इतिहास के प्रति कृतज्ञ होने की प्रेरणा देगा।

- डॉ. राकेश तैलंग, संयोजक, 'राज महोत्सव', राजसमंद

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