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विचार मंथन : ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठों- महर्षि रमण

ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठों- महर्षि रमण

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भोपाल

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Shyam Kishor

Mar 27, 2019

daily thought

विचार मंथन : ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठों- महर्षि रमण

ईश्वर तो हमारे निकट ही, उसकी प्राप्ति कठिन नहीं, बहुत ही सरल है
ईश्वर की प्राप्ति सरल है क्योंकि वह हमारे निकटतम है । जो वस्तु समीप ही विद्यमान है, उसे उपलब्ध करने में कोई कठिनाई क्यों होनी चाहिए ? ईश्वर इतना निष्ठुर भी नहीं है जिसे बहुत अनुनय विनय के पश्चात् ही मनाया या प्रसन्न किया जा सके । जिस करुणामय प्रभु ने अपनी महत्ती कृपा का अनुदान पग-पग पर दे रखा है, वह अपने किसी पुत्र को अपना साक्षात्कार एवं सान्निध्य प्राप्त करने में वंचित रखना चाहे, उसकी आकाँक्षा में विघ्न उत्पन्न करे वह हो ही नहीं सकता ।

जीवन-निर्माण एवं आत्म-विकास से ईश्वर प्राप्ति संभव हैं-
हमारे और ईश्वर के बीच में संकीर्णता एवं तुच्छता का एक छोटा-सा पर्दा है । जिसे माया का अज्ञान कहते हैं- प्रभु प्राप्ति में एक मात्र अड़चन यही है । इस अड़चन को दूर कर लेना ही विविध आध्यात्म साधनाओं का उद्देश्य है। तृष्णा और वासनाओं के तूफान में मनुष्य की आध्यात्मिक आकाँक्षाएं धूमिल हो जाती हैं । अस्तु वह जीवन-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए न तो ध्यान दे पाता है और न प्रयत्न कर पाता है । अगर ऐसा कर लिया जा सके तो ईश्वर प्राप्ति संभव है ।

ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठों
आज के तुच्छ स्वार्थों में निमग्न लोभी मनुष्य भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए तत्पर नहीं होता । अहंकार और अदूरदर्शिता को यदि छोड़ा जा सके, अपने-पन का दायरा बड़ा बनाकर यदि लोक हित को अपना हित मानने का साहस किया जा सके तो इतने- से ही ईश्वर प्राप्ति हो सकती है । ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठकर यदि इस विशाल विश्व में अपनी आत्मा का दर्शन किया जा सके-औरों को सुखी बनाने के लिये भी यदि आत्म-सुख की तरह प्रयत्नशील रहा जा सके तो ईश्वर की प्राप्ति किसी को भी हो सकती है कठिन आत्म-चिन्तन ही ईश्वर साक्षात्कार नहीं ।