विचार मंथन : समय के अनुसार परिवर्तन जरूरी, लेकिन परिवर्तन किसका... परंपरा या साधन का? - मुनि पूज्य सागर

विचार मंथन : समय के अनुसार परिवर्तन जरूरी, लेकिन परिवर्तन किसका... परंपरा या साधन का? - मुनि पूज्य सागर
विचार मंथन : समय के अनुसार परिवर्तन जरूरी, लेकिन परिवर्तन किसका... परंपरा या साधन का? - मुनि पूज्य सागर

Daily Thought Vichar Manthan : शब्दों से व्यक्ति की पहचान व विनय गुण का पता चलता है

अंतर्मुखी जैन मुनि पूज्य सागर जी युवाओं के मन की बात को समझते हुए अपने अनुभव अनुसार, कहते हैं कि युवा वर्ग का कहना है कि हम अपना जीवन पुरानी जीवन शैली के अनुसार नहीं जी सकते हैं। समय के अनुसार नहीं चलेंगे तो हम अपना विकास नहीं कर सकते, आज के युवा का यह कहना भी सही है कि समय के अनुरूप ही व्यक्ति को चलना चाहिए।

 

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समय के साथ परिवर्तन

इतिहास भी गवाह है कि समय के साथ परिवर्तन हुआ है। पहले मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुएं कल्पवृक्ष से मिल जाती थी। चाहे वह खाने पहनने की हो या फिर किसी अन्य आवश्यकता की। जैसे-जैसे समय निकलता गया मनुष्य को अपने हाथ से मेहनत कर अनाज, कपड़े प्राप्त करने के साधन जुटाने पड़े। सब को स्वयं काम कर परिवार का भरण-पोषण करना पड़ा।

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परंपराओं को बदले बिना भी विकास संभव है

प्राचीन काल में मनुष्य के पास कपड़े नहीं थे तो वह पेड़ों की छाल, पत्ते से अपने शरीर को ढांक लिया करते थे। अनाज खाने को नहीं था तो कच्चा मांस व फल खाकर अपना पेट भरते थे। इन बातों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है। यहां विचारणीय यह है कि बदलाव किसका...? परिवर्तन किसका...? परंपरा का या फिर साधनों का...? युवा वर्ग को यह सोचना होगा कि साधनों को बदलकर हम विकास कर सकते हैं, लेकिन परंपराओं को बदले बिना भी विकास संभव है और वही विकास स्थायी भी है।

 

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परिवार और समाज की मर्यादाओं को तोड़े नहीं

इस सोच का विकास करना होगा कि वर्तमान में जो पापाचार, अत्याचार, दुराचार महिलाओं व असहाय मजबूर लोगों के साथ हो रहा है वह कैसे दूर किया जा सकता है। आज हम समय के अनुसार बदलने की बात को कह कर बिना सोचे परंपराओं को बदलकर स्वयं का ही नुकसान कर रहे हैं। साधनों को बदलें और परिवार, समाज का विकास करें पर परंपराओं को बदलकर परिवार और समाज की मर्यादाओं को तोड़े नहीं। पहले हम एक दूसरे का हाल-चाल जानने के लिए पत्र का उपयोग करते थे अब ईमेल आदि आधुनिक साधनों का उपयोग होता है।

 

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शब्दों से व्यक्ति की पहचान व विनय गुण का पता चलता है

आधुनिक साधनों से समय भी बचता है और जल्द ही हमें एक दूसरे के बारे में जानकारी भी मिल जाती है। अब ईमेल पर हम बड़ों को प्रणाम और छोटों को प्यार की जगह हाय-हैलो लिखते हैं, यह परंपरा में बदलाव है जो अनुचित है। हम किसी भी साधन का प्रयोग करें पर शब्द चयन तो सही हो। प्रणाम या स्नेह जैसे शब्द भी तो प्रयोग कर सकते हैं। शब्दों से व्यक्ति की पहचान व विनय गुण का पता चलता है। कहा गया है कि शस्त्र वार का घाव तो भर सकता है, लेकिन शब्दों के वार का घाव नहीं भर सकता। शब्द और क्रिया हमारी संस्कृति के अनुसार व साधन समय के अनुसार हो तभी मनुष्य सही विकास कर सकता है।

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चारित्रिक आचरणी, ज्ञानी और विवेकी का सम्मान होता है

आज के युवाओं को स्वयं में विश्लेषण करना होगा कि हमारी सोच सही है या गलत? पाश्चात्य संस्कृति के औरॉ से निकलकर सही गलत का उचित निर्णय ही सही विकास को गति देगा। युवा वर्ग को शांतमन से विवेक के साथ यह चिंतन करना होगा कि आधुनिकता की इस होड़ में परिवार को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए? सम्मान उन्हीं का होता है जिनके पास चारित्रिक आचरण के साथ ज्ञान व विवेक होता है। मात्र ज्ञान का सम्मान नहीं किया जा सकता है।

 

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संस्कृति और परंपरा की राह

हम जिस परिवार समाज से हैं, हम जिस देश के हैं, उस संस्कृति मर्यादा तथा परंपराओं के पालन का पुरुषार्थ हमें करना चाहिए। मर्यादित आचरण और चरित्रवान व्यक्ति की पूजा होती है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का संपूर्ण जीवन चरित्र हमें हमारी संस्कृति के सम्मान की प्रेरणा देता है। इस तथ्य को समझना आज की आवश्यकता है। आप सभी युवाओं से आ‌व्हान है कि सत्य को समझकर गलत दिशा की ओर जाती अपनी सोच को सही दिशा में बदलें और विकास के स्थायी आधार बनें। सही मायने में विकास क्या है? इसे जानकर संस्कृति और परंपरा की राह पर चलकर परिवार, समाज और देश को स्थायी और सही विकास की दिशा देने में सहभागी बनें।

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