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भगवान विष्णु के चरों हाथों की उत्पत्ति के पीछे की रोचक कथा

भगवान विष्णु के दो हाथ मनुष्य के लिए भौतिक फल देने वाले हैं

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नई दिल्ली। वैदिक समय से ही विष्णु सम्पूर्ण विश्व की सबसे बड़ी शक्ति तथा नियंता के रूप में मान्य रहे हैं। हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रन्थों में बहुमान्य पुराणानुसार विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो रूप ब्रह्मा और शिव को माना जाता है। ब्रह्मा को जहां विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव को संहारक माना गया है। मूल रूप से विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा भी एक ही हैं इस मान्यता की भी हमेशा स्वीकृत रही है। न्याय को प्रश्रय, अन्याय के विनाश तथा जीव मानव को परिस्थिति के अनुसार उचित मार्ग-ग्रहण के निर्देश हेतु विभिन्न रूपों में अवतार ग्रहण करनेवाले के रूप में विष्णु मान्य रहे हैं।

विष्णु का निवास क्षीर सागर है। पुराण अनुसार विष्णु भगवान की पत्नी लक्ष्मी हैं। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित हैं। वह अपने नीचे वाले बाएं हाथ में पद्म (कमल), अपने नीचे वाले दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी), ऊपर वाले बाएं हाथ में शंख (पाञ्चजन्य) और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में सुदर्शन धारण करते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु को धरती पर सबसे ज्यादा मनुष्य रूप में अवतार लेने वाले सभी देवताओं में सबसे पहला स्थान दिया जाता है। अक्सर शेषनाग की शैय्या पर मौन होकर लेटे रहने वाले भगवान विष्णु का एक ऐसा रहस्य है जो उनके आशीष देने वाले हाथ से जुड़ा है। पौराणिक कथा के मुताबिक, प्राचीनकाल में जब भगवान शिव के मन में सृष्टि की रचना का विचार आया तो उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि से भगवान विष्णु को उत्पन्न किया।

उन्हें चार हाथ भी प्रदान किए जिसमें कई शक्तियां विदमान हैं। भगवान विष्णु के दो हाथ मनुष्य के लिए भौतिक फल देने वाले हैं, पीठ की तरफ बने हुए दो हाथ मनुष्य के लिए आध्यात्मिक दुनिया का मार्ग दिखाते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु के चार हाथ चारों दिशाओं की भांति अंतरिक्ष की चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रीहरि के यह चारों हाथ मानव जीवन के लिए चार चरणों और चार आश्रमों के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं पहला ज्ञान के लिए खोज ब्रह्मचर्य। दूसरा- पारिवारिक जीवन, दूसरा- वन में वापसी, चौथा- संन्यासी जीवन।