21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दूध, पनीर, घी और दही के अलावा चिकन भी नहीं खाने योग्य

-डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि के अपराध शास्त्र विभाग में हुई रिसर्च में किया गया दावा, दूध में कृमिनाशक दवाओं की पाई गई अधिक मात्रा    

2 min read
Google source verification

सागर

image

Aakash Tiwari

Dec 20, 2019

दूध, पनीर, घी और दही के अलावा चिकन भी नहीं खाने योग्य

दूध, पनीर, घी और दही के अलावा चिकन भी नहीं खाने योग्य

सागर. पनीर, घी, दूध और दही स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन शहर में बिक रहा दूध और उससे बने यह उत्पाद शरीर के लिए हानिकारक हैं। यह दावा डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के अपराध शास्त्र विभाग में हुई रिसर्च में किया है। माइसेलर लिक्विड क्रोमेटोग्राफी तकनीक के जरिए रिसर्च दल ने दूध और इससे बने उत्पादों में जरूरत से ज्यादा कृमिनाशक दवाओं की मात्रा पाई है। शोधार्थी डॉ. राजेंद्र प्रसाद पवार ने बताया कि दुधारू पशुओं के पेट में कीड़े होने पर पशुपालकों द्वारा कृमिनाशक दवाएं खिलाई जाती हैं। जब यह दवाएं खिलाई जाती हैं तो करीब एक हफ्ते तक इनका दूध उपयोग में नहीं लाया जाता है। लेकिन पशुपालकों द्वारा यही दूध बेचा जा रहा है और दुकानदार इनसे घी, दूध, पनीर और दही बनाकर बेच रहे हैं।

-सागर और छिंदवाड़ा जिले से लिए सैंपल
डॉ. पवार ने बताया कि रिसर्च के लिए सागर और छिंदवाड़ा जिले से गाय, भैंस, बकरी के दूध के सैंपल लिए गए थे। इनसे उत्पाद बनाकर उनकी भी जांच की गई। सभी में कृमिनाशक दवाओं की मात्रा अधिक मिली। दूध के ७० और इससे बने उत्पादों के ४०० सैंपल लेकर जांच की थी। जांच में यह बात भी सामने आई कि दुधारू पशुओं को भी क्षमता से अधिक कृमिनाशक दवाओं का डोज दिया जा रहा है। इस वजह से दूध में इस दवा का असर सबसे ज्यादा पाया जा रहा है।

-चिकन भी नहीं खाने योग्य

मुर्गों व मुर्गियों के मांस पर भी रिसर्च की गई है। इनमें भी कृमिनाशक दवाओं का अधिक प्रभाव मिला। इन्हें कृमि होने पर एल्बेंडाजोल जैसी दवाएं दी जाती हैं। लेकिन इन्हें दवा खिलाने के बाद एक दो दिन में ही इनका उपयोग चिकन के तौर पर किया जाता है। एेसे में मीट के कई हिस्सों में कृमिनाशक दवाओं का असर रहता है। इस तरह के मीट के लगातार सेवन से शरीर पर बुरा असर पड़ता है।

-यूरिन और गोबर से जमीन पर पड़ रहा बुरा असर
दुधारू पशुओं के द्वारा किए जा रहे गोबर और यूरिन से जमीन पर पाए जाने वाले पोषक तत्वों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। कृमिनाशकों के अधिक डोज के कारण गोबर और यूरिन में हानिकारक तत्व जमीन पर पाए जाने वाले पोषक तत्वों को नष्ट कर देते हैं।

यह है प्रभाव

-गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक।
-उबालने से भी नष्ट नहीं होता दवाओं का असर।

-लिवर, किडनी पर डालता है असर।
-प्लेटलेट कम होती हैं।

-फूड विभाग कर सकता है तकनीक का उपयोग

जानकारी के अनुसार फूड विभाग विवि द्वारा की गई इस रिसर्च का उपयोग कर सकता है। अपनी लैब में यह जांच आसानी से की जा सकती है। अभी फूड विभाग दूध और इससे बने उत्पादों में कृमिनाशक दवाओं की मात्रा की जांच नहीं करता है।


दूध में मिलावट होती है। इसे आसानी से समझ सकते हैं, लेकिन कृमिनाशक दवाओं की मात्रा इसमें होती है, इसी आशंका को लेकर २०१४ में यह रिसर्च शुरू की गई थी। दूध और उससे बने उत्पादों में कृमिनाशक दवाओं की अधिक मात्रा पाई गई। पशुपालकों और उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए यह रिसर्च की गई है।

डॉ. राजेंद्र पवार, पीएचडी, शोधार्थी, अपराध शास्त्र विभाग


रिसर्च में जिन पैरामीटर पर जांच की गई वह सही पाई गईं। रिसर्च इंटरनेशनल जरनल में प्रकाशित हो चुकी है। रिसर्च में दूध और चिकन में कृमिनाशक दवाओं की अधिक मात्रा पाई है। निश्चित रूप से इसका नियमित सेवन शरीर के लिए हानिकारक है।

डॉ. देवाशीष बोस, रिसर्च गाइड अपराधि शास्त्र विभाग