
Culture of Indian Culture Vasudhaiva Kutumbakam
सागर. भारतीय संस्कृति आत्मविज्ञान एवं आत्मज्ञान की संस्कृति है। यह हमें नीचे से ऊपर की ओर ले जाती है। भारत ऐसा देश है जिसने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया है, जो हिंसा से दूर रहते हैं वही हिन्दू
कहलाते हैं।
यह बात लंदन से आई मि लूसी गेस्ट ने कही। वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा अतुल्य भारत: संस्कृति और राष्ट्र विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहीं थीं। धर्म और दर्शन के मर्मज्ञ डॉ. श्याम सुन्दर दुबे ने कहा कि हमारा देश प्रकृति पूजक है। हम जल, धरती, वायु, आकाश सभी प्राकृतिक स्पंदनों से संचालित होते हैं। यह धरोहर किसी ओर देश के पास नहीं है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. मीना पिंपलापृरे ने कहा कि भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी जीवित संस्कृति है। ग्रीक, रोम न, माया, चीनी सभ्यताओं का क्या हश्र हुआ, हम सभी जानते हैं परन्तु वैदिक संस्कृति आज भी पूरे विश्व को स्पंदित कर रही है। योग उसका एक उदाहरण है।
संगोष्ठी के मार्गदर्शक डॉ. श्रीराम परिहार भी मंचासीन थे। स्वागत अभिभाषण प्राचार्य डॉ. जीएस रोहित ने देते हुए इस विषय की प्रासंगिकता व महत्व पर प्रकाश डाला। उद्घाटन सत्र का संचालन संगोष्ठी संयोजक डॉ. सरोज गुप्ता ने व आभार डा. संध्या टिकेकर ने माना। इस अवसर पर अतुल्य भारत: संस्कृति और राष्ट्र पुस्तक का विमोचन भी किया गया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता योगाचार्य विष्णु आर्य ने करते हुए योग को विश्व के लिए भारत की ओर से दिया एक बड़ा वरदान बताया। सारस्वत वक्ता के रूप में काशी हिन्दू विवि से पधारे डॉ. संजीव सराफ ने कहा कि इतने तरह की विविधताओं के बावजूद भी भारत एकसूत्र में बंधा हुआ है। द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता भोपाल से आए डॉ. राधावल्लभ शर्मा ने की। इस दौरान डॉ. सरोज गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक सृजन के आलोक का विमोचन किया गया। इस अवसर पर मुख्य रूप से रीवा विवि के पूर्व कुलपति प्रो. उदय जैन, प्रो.एससी जैन आदि मौजूद थे।
Published on:
24 Dec 2018 03:43 pm
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