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राई में रचे बसे राम सहाय आईसीयू में भी गाते रहे ‘राधा हेरे बांट मोहन अबेलो ने आयरे’

इस बार हाथ में न मृदंग था न मंच, लेकिन हाव भाव वही थे सागर. नाक में ट्यूब, दायें हाथ में लगा कैनुला, पल्स ऑक्सीमीटर, बायें हाथ में बीपी मापने का कफ इसके बाद भी पद्मश्री राम सहाय पांडे राई गाने से नहीं चूके। इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी राई […]

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इस बार हाथ में न मृदंग था न मंच, लेकिन हाव भाव वही थे

सागर. नाक में ट्यूब, दायें हाथ में लगा कैनुला, पल्स ऑक्सीमीटर, बायें हाथ में बीपी मापने का कफ इसके बाद भी पद्मश्री राम सहाय पांडे राई गाने से नहीं चूके। इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी राई में रमे बसे राम सहाय राई को पूरी भाव भंगिमाओं के साथ गुनगुनाते रहे, 'राधा हेरे बांट मोहन अबेलो ने आयरे' इस बार उनके हाथ में मृदंग नहीं था, लेकिन उनके भाव वैसे ही थे। उन्हें चिंता अपने दिल की धड़कनों की नहीं, बल्कि राई की थी। वे कहते थे जब तक राई नृत्य करता हूं, थकान नहीं होती। आईसीयू में भी जब शरीर थकने लगा तो राई गाकर अपनी थकान दूर की, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। राई नृत्य का ये नायक अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन अस्पताल में भर्ती के दौरान सामने आया उनका एक वीडियो इस बात की गवाही दे रहा है कि मरते दम तक वे राई को ही समर्पित रहे। अंतिम सांस लेने के पहले भी राई गाई।

दरअसल बीमारी के चलते उन्हें जब लोग अस्पताल में देखने के लिए पहुंचे, तब वे राई गा रहे थे। राम सहाय पांडे का मंगलवार की सुबह निधन हुआ। पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे और उनका इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा था। अस्पताल में उन्होंने राई को याद रखा।

पत्रिका को उनके बेटे संतोष पांडे ने बताया कि पिताजी अस्पताल में बीमारी के चलते कई दिनों से भर्ती थे। पिछले कुछ दिनों में उनका स्वास्थ्य बार-बार खराब हो रहा था, लेकिन उन्होंने राई को नहीं छोड़ा। अस्पताल में आने वाले लोगों को भी वे अपने हाव-भाव से राई करते दिखते थे। वे पैरों से खड़े नहीं हो पा रहे थे, लेकिन लेटे हुए भी उनके मन में केवल राई थी।

पूरी जिंदगी किया संघर्ष
संतोष ने बताया कि उनके दादा लालजी पांडे का जब निधन हुआ था, तब उनके पिता राम सहाय पांडे 6 वर्ष के थे। बारह वर्ष की उम्र से उन्होंने राई करना शुरू कर दिया। पूरी जिंदगी गरीबी में संघर्ष किया। गरीबी में जीवन की यात्रा शुरू हुई, तो कांटों पर चलते रहे। उन्होंने न समाज की चिंता की, न ही परिवार की।

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