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सरूपगंज।सर्दी का मौसम आते ही लोग सेहत के लिए अलग-अलग प्रकार के पाक बनाकर खाते है। वहीं गरीब लोग महंगाई के जमाने में अपनी सेहत के लिए तिल से बनी सेली खाकर अपनी सेहत का ख्याल रखते हैं। सर्दी का मौसम आते ही सेहत का मेवा तिल से बनी सेली की याद जरूर आ जाती हैं। समीपवर्ती वाटेरा व रोहिड़ा में परम्परागत ढंग से बनाई जाने वाली एक बैल की घाणी वाली सेली आसपास के ग्रामीणों में प्रसिद्ध हैं।
कई लोग इसे देशावर भी ले जाते हैं। शैली लेने के लिए आसपास के गांवो से लोग खरीदकर सेली ले जाते हैं तो कई लोग तिल खरीदकर उससे सेली भी बनवा कर ले जाते हैं। आम तौर पर सर्दी में लोग उड़द व मैथी के लड्डू बनाकर खाते हैं, लेकिन गरीबों का मेवा कहीं जाने वाली तिल की सेली को आम आदमी का मेवा कहा जाता हैं। इसके खाने से शरीर में ऊर्जा व स्फूर्ति आती हैं।
ऐसे बनती है सेली
सेली बनाने के लिए पहले तिलों को साफ पानी में धोकर सूखाया जाता है। इसके बाद बैल की घाणी में पिसाई के बाद गुड़ मिलाकर सेली बनाई जाती हैं। इस प्रकार तैयार सेली आजकल बाजार में मोटरसाइकिल पर बिकने के लिए भी आ रही हैं। सेली कई प्रकार की बनाई जाती हैं सादे तिल से बनाई गई सेली के साथ कई धनाढ्य लोग सूखे मेवे काजू, किशमिश, बादाम व पिस्ते मिलाकर सेली तैयार कर खाते हैं।
समय के साथ बदला तरीका
वाटेरा में सेली बनाने वाले युसुफखान बताते हैं कि परम्परागत तरीके से बनने वाली सेली एक बैल के घाणे से बनाई जाती हैं, लेकिन महंगाई के जमाने में बैल रखना व उसकी सार-संभाल करना मुश्किल हैं। हम बैल को किराये पर लेकर आजकल घोणी चला रहे हैं। पर, समय के साथ उसका विकल्प भी निकाल दिया।
आजकल इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी वाले घाणे भी बाजार में आ गए हैं। इससे सेली बनाना और भी आसान हो गया हैं। इसमें समय की भी बचत हो रही हैं।
