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4 महीने की उम्र में ही मौत के मुंहाने पहुंच गए थे शास्त्री, मां की ममता ने बचाई थी जान

पूरा मसला साल 1905 के फरवरी महीने का है। शास्त्री जी अपने पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और मां राम दुलारी देवी के साथ गंगा स्नान के लिए इलाहाबाद आए थे।

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Sunil Chaurasia

Jan 11, 2018

lal bahadur shastri

नई दिल्ली। देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आज ही के दिन 11 जनवरी 1966 में उज़बेकिस्तान के ताशकंद में निधन हो गया था। आज पूरा देश देश के दूसरे प्रधानमंत्री की 52वीं पुण्यतिथि मना रहा है। बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री के राजनीतिक जीवन में उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव का सबसे बड़ा हाथ था। जानकार बताते हैं कि लाल बहादुर राजनीति में अपने पिता की दिलेरी के बगैर कभी सफल नहीं हो पाते।

यूं तो शास्त्री जी कई सारे किस्से आपको आसानी से मिल सकते हैं। शास्त्री जी के जीवन पर कई लेखकों ने अब तक सैकड़ों किताबें लिखी हैं। जिनमें लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के जन्म से लेकर मृत्यु तक की सभी अहम बातें मिल जाती हैं। लेकिन आज हम आपको शास्त्री जी के जीवन की एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं, जिसे सुनने के बाद आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

पूरा मसला साल 1905 के फरवरी महीने का है। शास्त्री जी अपने पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और मां राम दुलारी देवी के साथ गंगा स्नान के लिए इलाहाबाद आए हुए थे। ये वो वक्त था जब शास्त्री जी केवल 4 महीने के थे और वे अपनी मां के गोद में आराम फरमा रहे थे। माघ का समय था, लिहाज़ा घाट पर भीषण भीड़ थी। भीड़ में शास्त्री जी की मां धक्का लगने की वजह से गिर गई थीं और इसी दौरान वे उनसे दूर हो गए थे।

अपने जिगर के टुकड़े को खुद से दूर होते ही रामदुलारी बदहवास हो गईं। शास्त्री जी की मां ने चारों ओर घूम के देखा तो भी वे नहीं मिले। उस वक्त वहां कई सारी नाव थीं, जो लोगों को एक क्षोर से दूसरे क्षोर पर ले जाने के लिए खड़ी थीं। उन्हीं में से एक नाव में एक दूधिया भी बैठा था जिसकी गोद में मां का लाल पहुंच गया था। लेकिन यहां नसीब कुछ और ही चाहता था। बता दें कि दूधिया का कोई बच्चा नहीं था, परिणामस्वरूप उसने शास्त्री जी को भगवान का आशीर्वाद समझकर अपने पास ही रख लिया।

वहीं दूसरी ओर काफी देर तक ढूंढने के बाद भी जब शास्त्री जी नहीं मिले तो उनके पिता ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराई थी। जिसके बाद घाट पर दोबारा ढूंढे जाने के दौरान पिता को नाव में रखे एक टोकरी में एक बच्चा रो रहा था। पास में जाकर शारदा जी के होश उड़ गए, वो बच्चा कोई और नहीं बल्कि उनका नन्हे ही था। शास्त्री जी की मां उन्हें नन्हे के नाम से बुलाती थीं।

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