
संदीप पुरोहित
रेतीले धोरों में पानी की धारा अमृत की धारा है। हर एक पानी की बूंद को मारवाड़ ने सहेज कर खूब अच्छे से रखा है। पर आजादी के बाद विकास की गति ने पानी को प्रदूषित भी किया है। अजमेर के नागपहाड़ से निकलने वाली 495 किमी लंबी लूणी नदी जोधपुर, पाली, बालोतरा, जालोर होते कच्छ के रण तक जाती है। यह बरसाती नदी है लेकिन औद्योगिक प्रदूषण से इसकी हालत खराब हो चुकी है।
जोधपुर, पाली और बालोतरा में करीब 2 हजार टैक्सटाइल फैक्ट्रियां जहरीला पानी नदी में छोड़ती हैं। इस कारण नदी का पानी न तो पीने योग्य रहा न ही सिंचाई के योग्य बचा। कथित विकास ने मारवाड़ की गंगा लूणी के पानी पर पानी फेर दिया। आज जितनी आवश्यकता गंगा की सफाई की है उतनी ही आवश्यकता हमारी मरु गंगाा लूणी की भी है। यह नदी मारवाड़ की लाइफ लाइन है। जब यह बहती है तो मारवाड़ खिल उठता है।
आज पूरी दुनिया में क्लाइमेट चेंज का असर साफ दिखाई दे रहा है। मारवाड़ भी इससे अछूता नहीं है। इस बार जून से सक्रिय मानसून के कारण लूणी नदी फिर कल-कल बहने लगी है। जुलाई में यह बाड़मेर-जालोर बॉर्डर के गांधव तक पहुंची, जहां ग्रामीणों ने पूजा की। ढोल-थाळी से पूजन किया। जगह-जगह नदी को चुनरी ओढ़ाई जा रही है। यहां से बाड़मेर का बाकासर बॉर्डर कुछ ही दूर पर ही है, जहां से कच्छ का रण शुरू हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन से नई उम्मीद जागी है। हम सब मिलकर अगर सही दिशा में प्रयास करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब लूणी प्रदूषण से मुक्त होगी। साथ ही वनीकरण भी करना होगा ताकि यह बारहमासी नदी बने। केवल सरकार के भरोसे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। कारखानों के प्रदूषित पानी को रोकना ही होगा। वर्तमान ट्रीटमेंट प्लांट नाकाफी हैं। हम सबको भी अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे। राजस्थान पत्रिका लगातार पिछले कई सालों से लूणी को प्रदूषण मुक्त करने के भागीरथी प्रयास कर रहा है।
इन प्रयासों के चलते ही शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) ने 650 करोड़ की डीपीआर तैयार की थी, जिसे केंद्र ने मंजूरी दी। पर अभी मंजिल बहुत दूर है। यदि नई तकनीक से सभी इकाइयों का पानी जिलों में ही रीसाइकिल कर लिया जाए तभी जाकर लूणी को नया जीवन मिलेगा। इसे माही नदी से लूणी को जोडऩे का प्रस्ताव है, जिससे पेयजल उपलब्ध होगा और नदी में सालभर पानी रहेगा। अगर हमें लूणी को बारहमासी बनाना है तो इसे माही नदी से भी जोडना होगा। नदी के दोनों किनारों पर 5 किमी तक लाखों पौधे लगेंगे तभी जाकर हीटवेव और कार्बन उत्सर्जन कम होगा। मिट्टी की उर्वरता लौटेगी, कृषि और बागवानी फिर शुरू हो सकेगी।
अगर हम ईमानदारी से इस काम को अंजाम दें तो मारवाड़ के विकास के नए आयाम खुलेंगे। पर्यटन के विकास में लूणी मील का पत्थर साबित हो सकती है। हाइड्रोजन प्लांट और टूरिज्म से अरबों की आय संभव है। रिफाइनरी, टैक्सटाइल जोन और इको-टूरिज्म को जोड़ते हुए हमें आगे बढऩा होगा। रेगिस्तान के धोरे तो पूरी दुनिया में प्रख्यात हैं पर अब समय आ गया धोरों के साथ रिवरफ्रंट भी बनाकर तैयार करें। जोधपुर से बाखासर बॉर्डर तक साबरमती जैसा रिवरफ्रंट बनकर तैयार हो सकता है।
साथ ही इको पार्क और रण सफारी से नए विकास के मार्ग खुलेंगे। यही नहीं हमारी मरुगंगा के जल प्रवाह से धार्मिक पर्यटन को भी गति मिलेगी। नाकोड़ा, आसोतरा, तिलवाड़ा मेले को भी बढ़ावा मिलेगा। पर इन सबको कागजों से निकालकर हमें जमीन पर उतारना होगा। इसके लिए पत्रिका कृत संकल्प है। बस आप भी बढ़ाएं पत्रिका के साथ एक कदम धोरों में गंगा के लिए। फिर देखिए लूणी ही आपके लिए सबसे मीठी साबित होगी। आओ मिलकर लूणी बचाओ।
Updated on:
03 Feb 2026 09:38 pm
Published on:
03 Feb 2026 09:38 pm
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