बिना रसायन की खेती, उत्पादन से ज्यादा मांग, विश्व खाद्य दिवस - जिले में बढ़ रही प्राकृतिक खेती करने वालों की संख्या, गुणवत्तायुक्त भोजन की आदत भी विकसित हो रही, उन्नत कृषक राजाराम गोयल ने प्राकृतिक खेती को अपनाया।
उज्जैन. कहते हैं जैसा अन्न, वैसा मन और उज्जैन का मन अन्न के मामले में काफी अमीर है। भूखे को भोजन देने से लेकर अपने भोजन में शुद्धता को प्राथमिकता देने तक, शहरवासी आगे बढ़ रहे हैं। रविवार को विश्व खाद्य दिवस World Food Day मनाया जा रहा है। खाद्य समस्या को दूर करने के उद्देश्य से हर साल 16 अक्टूबर को इसे मनाया जाता है। वर्तमान में सिर्फ हर पेट को भोजन देना ही जरूरत नहीं बल्कि शुद्ध फसल और सुरक्षित खाद्य सामग्री उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण है। अच्छी बात है कि इन तीनों जरूरतों की पूर्ति के लिए उज्जैन मन से कार्य कर रहा है। यहां इतनी शुद्ध फसलें उगाई जा रहीं हैं कि उत्पाद से पहले ही बुकिंग Advance Booking of pure pulses हो रही है.
यहां एक भूखे को खिलाने के लिए हैं दस हाथ
यह उज्जैन की खासियत है कि किसी एक के भूखे होने की जानकारी मिलती है तो उसको निवाला देने 10 हाथ तैयार हो जाते हैं। शहर में शासकीय, धार्मिक, निजी स्तर पर नि:शुल्क या नाममात्र के शुल्क में स्वादिष्ट और गुणवत्तायुक्त भोजन उपलब्ध करवाने वाले कई केंद्र हैं। दीनदयाल रसोई योजना में पांच स्थानों पर जरूरतमंदों को नि:शुल्क भोजन दिया जाता है। महाकाल मंदिर और चामुंडा माता मंदिर पर प्रसाद के रूप में रोज सैकड़ों लोग भोजन पाते हैं।
एक ही लक्ष्य, कोई भूखा न सोए- स्वर्णिम भारत मंच और रॉबिन हुड जैसी कई संस्थाएं हैं जो रोज ही जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाती है। कोई भूखा न सोए इस उद्देश्य से रॉबिन हुड आर्मी शहर में वर्ष 2016 से कार्य कर रहा है। संस्था के अनुराग आचार्य बताते हैं, एक ओर बड़ी मात्रा में भोजन फेंकने की स्थिति बनती है वहीं दूसरी ओर हजारों लोगों को एक वक्त का भोजन भी नहीं मिलता है। शहर के अधिकांश होटल, केटर्स, मैरिज गार्डन आदि से संस्था सदस्यों का संपर्क है। कहीं से भी भोजन बचने की जानकारी मिलने पर उसे कलेक्ट कर गरीब बस्तीयों में वितरित किया जाता है। औसत रोज ही 150 लोगों को भोजन वितरित हो रहा है। अब तक 3 लाख 75 हजार से अधिक भोजन पैकेट वितरित किए जा चुके हैं।
किसानों ने फिर प्राकृतिक (आर्गेनिक) खेती अपनाना शुरू किया है। जिले में करीब 465 किसान 500 बीघा से अधिक जमीन पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे अपने परिवार को शुद्ध खाद्य सामग्री देने के साथ ही बाजार में भी इन्हें उपलब्ध करवा रहे हैं। इससे उन्हें अच्छी आय भी हो रही है। कृषि विभाग उप संचालक कमलेश राठौर बताते हैं, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने जिले में लगातार अभियान चलाया जा रहा है। किसानों को बताया जाता है कि पूरे खेत में न सही लेकिन कुछ भाग में प्राकृतिक खेती जरूर करें ताकि अपने परिवार को वे रसायन मुक्त भोजन सामग्री दे सकें।
उत्पाद से पहले ही दाल की बुकिंग हुई
उन्नत किसान राजाराम गोयल वर्ष 2016 से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने दो एकड़ में तुअर दाल बोई थी लेकिन लोगों की मांग व एडवांस बुकिंग Advance Booking of pure pulse पर इस बार 12 एकड़ में दाल लगाना पड़ी है। प्राकृतिक खेती में उत्पादन तुलनात्मक थोड़ा कम होता है इसलिए कीमत थोड़ी अधिक रहती है लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद है। उनकी फसल उज्जैन, इंदौर के साथ ही महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दिल्ली आदि भी निर्यात होती है।