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यह कंबल-स्वेटर इतने सस्ते नहीं, जानिए इनसे असली कीमत

पत्रिका सोशल प्राइड- यह है नेकी की गरमाहट, कड़कड़ाती ठंड में जरूरतमंदों का बनती सहारा, शहर में कई लोग जो हर साल ठंड में वितरित करते हैं गर्म कपड़े, अनजानों के लिए बनते अपने

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This blanket-sweater is not so cheap, know the real price from them

पत्रिका सोशल प्राइड- यह है नेकी की गरमाहट, कड़कड़ाती ठंड में जरूरतमंदों का बनती सहारा, शहर में कई लोग जो हर साल ठंड में वितरित करते हैं गर्म कपड़े, अनजानों के लिए बनते अपने

उज्जैन. अधिकांश लोगों के लिए ठंड का मौसम यानी गर्म पकवानों का आनंद, घूमने-फिरने का मजेदार वक्त और यदि सेहत के प्रति जागरुक हैं तो शरीर साधने के लिए उपयुक्त समय... लेकिन एेसा हर किसी के लिए नहीं है। कई लोग एेसे भी होते हैं, जिनके लिए ठंड सांसे छीनने वाली लगती हैं, वह भी सिर्फ इसलिए कि उनके पास तन ढंकने को एक कंबल-स्वेटर तक नहीं होता। एेसे में कंबल-स्वेटर की असली कीमत इन्हें पता होती है। एेसी स्थिति में नेकी की गरमाहट उन्हें मौसम के रूप में उनके लिए आई मुसीबत से बचाती है। शहर के लिए न सिर्फ यह अच्छे संकेत हैं, बल्कि गर्व की भी बात है कि यहां एेसे कई लोग हैं जो इस नेकी की गरमाहट का हिस्सा बनते हैं।

ठंड का मौसम शुरू होने के साथ ही जहां कई लोग इसका आनंद उठाने की तैयारी कर रहे हैं वहीं कई एेसे भी हैं, जिन्हें इस बात का डर सताने लगा है कि उनके पास ठंड का समय काटने के लिए गर्म कपड़े नहीं है। एेसे जरूरतमंदों के लिए शहर में कई लोग हर साल सहयोग के हाथ बढ़ाते हैं। कोई संगठन के रूप में तो कोई व्यक्तिगत स्तर पर अपनी क्षमतानुसार गर्म वस्त्र नि:शुल्क बांट जरूरतमंदों की मदद करते हैं, जिस तरह ठंड का आनंद लेने के लिए कई व्यक्ति अपने-अपनी तैयारियों में लगा है, उसी तरह एेसे मददगारों ने भी अनजान जरूरमंदों की मदद के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। ठंड में जरूरतमंदों को नेकी की गरमाहट देने वाले शहर के कुछ एेसे ही लोगों से चर्चा कर जाना उनका अनुभव।

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तीन शर्ट पहनकर आया छात्र, एक स्वेटर नहीं था

दीपेश राका, अंकुर नाहर, विक्रांत जैन सहित शहर के कुछ युवाओं की टीम दो वर्ष से सरकारी स्कूलों में जाकर गरीब बच्चों को स्वेटर बांट रही है। अधिकांश स्कूल शहर के आसपास सटे गांवों के होते हैं। पिछले वर्ष इन युवाओं ने एक हजार गरीब विद्यार्थियों को स्वेटर वितरित किए थे। इस बार फिर यह युवा एेसे ही विद्यार्थियों की मदद करने की तैयारी कर रहे हैं। विक्रांत जैन कहते हैं, पिछले वर्ष एक स्कूल में एक बच्चा सिर्फ इसलिए एक साथ तीन शर्ट पहनकर स्कूल आया था क्योंकि उसके पाए एक स्वेटर तक नहीं था। इससे हम समझ सकते हैं कि आज भी एक बड़े वर्ग को समाज के सहयोग की आवश्यकता है। युवाओं ने ठंड में कई बच्चों के हाथ-पांव व गाल की चमड़ी फटी देखी जिसके चलते इस वर्ष वे उन्हें स्वेटर के साथ बॉडी लोशन क्रीम और मोजे भी देंगे। टीम के सदस्य अपने स्तर पर भागीदारी करने साथ ही सोशलन मीडिया के जरिए अन्य से भी सहयोग लेते हैं।

कंबल खत्म हुए तो घर का दे दिया

सरफराज कुरैशी, नईम खान सहित शहर के कुछ लोगों ने जरूरतमंदों की मदद के लिए जज्बा सोशल फाउंडेशन का गठन किया है। वे वर्ष २०१२ से हर ठंड के मौसम में गरीब बस्ती या फुटपाथ पर रात बिताने वाले जरूरतमंदों को कंबल वितरित करते हैं। संसाधन जुटाने के लिए फाउंडेशन के सदस्य ही भागीदारी करते हैं और अन्य किसी से सहयोग नहीं लेते। इस बार भी यह लोग जरूरतमंदों के लिए कंबल वितरण की तैयारी कर रहे हैं। नईम खान एक घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं, पिछले वर्ष एक व्यक्ति ने देर रात फाउंडेशन के अध्यक्ष सरफराज कुरैशी को फोनकर सूचना दी कि एक बुजुर्ग सड़क किनारे ठंड से बेहद ठिठुर रहा है। कंबल खत्म हो चुके थे इसलिए कुरैशी ने सुबह नए कंबल की व्यवस्था कर बुजुर्ग तक पहुंचाने का कहा। इस पर संबंधित व्यक्ति ने कहा कि उस बुजुर्ग के लिए रात काटना ही तो मुश्किल हो रहा है। फोन पर हो रही यह बाते, कुरैशी की पत्नी भी सुन रही थीं। उन्होंने वही कंबल उस बुजुर्ग को देने का कहा, जो वह ओढ़े हुए थीं। १० मिनट बाद उस बुजुर्ग के पास ओढऩे के लिए कुरैशी के घर का कंबल था। खान के अनुसार एक आम व्यक्ति के लिए कंबल ठंड से बचने के लिए साधारण सामग्री हो सकती है लेकिन कई लोग एेसे भी होते हैं जिनके लिए वही कंबल जिंदगी बचाने का साधन होता है।