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दिव्य ‘शिव तांडव’ स्वरूप में महाकाल, 44 घंटे के लिए खुले मंदिर के कपाट, दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु

Mahashivratri 2026 : महाशिवरात्रि पर बाबा महाकाल की विशेष भस्मारती पूरी हुई। मंदिर के पट 44 घंटे तक खुले रहेंगे और इस दौरान करीब 10 लाख श्रद्धालुओं के दर्शन करने की उम्मीद है।
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उज्जैन

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Mohammad Faiz Mubarak

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Updated: 15 Feb 2026, 9:10 AM IST

Mahashivratri 2026

दिव्य 'शिव तांडव' स्वरूप में महाकाल (Photo Source- Patrika)

Mahashivratri 2026 : महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर देशभर के सभी ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ मध्य प्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन में स्थित बाबा महाकाल के दरबार में विशेष भस्मारती समारोह संपन्न हुआ। इस मौके पर मंदिर के गर्भगृह के पट रात 2.30 बजे से श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, जो अगले 44 घंटे खुले रहेंगे। महाशिवरात्रि पर मंदिर में करीब 10 लाख श्रद्धालुओं के दर्शन करने की उम्मीद है। बाबा महाकाल ने अपने भक्तों को दिव्य और मनमोहक 'शिव तांडव' स्वरूप में दर्शन दिए। यहां भस्मारती, विशेष श्रृंगार और शिव नवरात्रि जैसे आयोजन होते हैं। इस अवसर पर सेहरे का प्रसाद भी बांटा जाता है, जिसे खासा शुभ माना जाता है।

महाशिवरात्रि पर महाकाल मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ा हुआ है। सुबह 2.30 बजे बाबा महाकाल का विशेष पंचामृत अभिषेक हुआ। साथ ही, भस्मारती भी की गई। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां दर्शन करने आ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि, महाशिवरात्रि पर बाबा महाकाल के दर्शन का विशेष महत्व है। इसी के चलते मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की है।

'शिव तांडव' स्वरूप में मनमोहक दर्शन

बाबा महाकाल ने अपने भक्तों को दिव्य और मनमोहक 'शिव तांडव' स्वरूप में दर्शन दिए। ये अद्भुत अवसर शिवनवरात्रि उत्सव के तहत आयोजित किया गया, जो महाशिवरात्रि से पूर्व 10 दिनों तक मनाया जा रहा है। इस उत्सव में बाबा महाकाल रोजाना अलग-अलग रूप धारण कर भक्तों को दर्शन देते हैं। खासतौर पर तांडव स्वरूप ने भक्तों को निहाल कर दिया। इस रूप में भगवान महाकाल को नवीन वस्त्र, भव्य मुकुट और अन्य आभूषणों से सजाया गया। शिव तांडव का ये स्वरूप भगवान शिव के रौद्र और नृत्य रूप को प्रदर्शित करता है जो भक्तों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।

इस तरह हुआ बाबा का श्रंगार

भस्मारती से पहले बाबा महाकाल का पंचामृत अभिषेक हुआ। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और खांडसारी शक्कर शामिल थे। इसके बाद बाबा को चंदन का लेप लगाया गया और सुगंधित द्रव्य अर्पित किए गए। बाबा को उनकी प्रिय विजया (भांग) से श्रृंगारित किया गया और श्वेत वस्त्र पहनाए गए। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के बीच भस्मारती संपन्न हुई, जिसे देखकर भक्त भाव-विभोर हो गए।

सेहरा सजावट और भस्मारती

शिवरात्रि के अगले दिन बाबा का सेहरा सजाया जाता है। वहीं, दोपहर में भस्म आरती की जाती है। ऐसा साल में सिर्फ एक बार ही होता है। बाबा के सेहरे को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। लोग इसे बहुत शुभ मानते हैं। सेहरे के फूल-पत्तियों को संभालकर रखते हैं। मान्यता है कि, इससे घर में सुख-शांति और धन-धान्य की बढ़ोतरी होती है।

दिनभर चली पूजा-अर्चना

भस्मारती के बाद दद्योदक आरती और भोग आरती के बाद दोपहर 12 बजे उज्जैन तहसील की ओर से पूजन-अभिषेक संपन्न हुआ। शाम 4 बजे होल्कर और सिंधिया स्टेट की ओर से पूजन और सायं पंचामृत पूजन के बाद भगवान महाकालेश्वर की नित्य संध्या आरती हुई। रात्रि में 8 बजे से 10 बजे तक कोटितीर्थ कुण्ड के तट पर विराजित श्री कोटेश्वर महादेव का पूजन, सप्तधान्य अर्पण और पुष्प मुकुट श्रृंगार (सेहरा) के बाद आरती की गई। रात्रि 10.30 बजे से सम्पूर्ण रात्रि भगवान महाकालेश्वर का महाअभिषेक संपन्न हुआ। इसमें 11 ब्राह्मणों द्वारा रूद्रपाठ और विभिन्न मंत्रों के माध्यम से अभिषेक किया गया।