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खास होता है बनारस में बकरीद का त्योहार

अंग्रेजों के जमाने से बनारस में होती है ऊंटों की कुर्बानी

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Varanasi Uttar Pradesh

Sep 11, 2016

Bakrid festival

Bakrid festival

वाराणसी. बनारस में बकरीद का त्योहार खास होता है। यहां तकरीबन आठ सौ साल पहले मुसलमान आए और फिर यहीं रच-बस गए। बनारस की सबसे पुरानी ईदगाह पुराना पुल इसकी गवाह है। इसके अलावा अजगैब शहीद पर मस्जिद के खंडहर भी इसका सबूत देते हैं। अंग्रेजों के जमाने से यहां ऊंटों की कुर्बानी दी जाती है। वर्तमान समय में पूर्वांचल की सबसे बड़ी बकरा मण्डी भी बनारस के बेनिया बाग मैदान में ही सजती है। इस बार बकरीद का त्योहार मंगलवार यानि 13 सितम्बर को मनाया जाएगा। बनारस में ऊंटों और दुम्बों की कुर्बानी भी मशहूर है। बनारस के रेवड़ी तालाब और उस्मानपुरा में एक-एक और कोयला बाजार में अलग-अलग दिन दो ऊंटों की कुर्बानी दी जाती है। इस कुर्बानी को देखने के लिये बड़ी तादाद में भीड़ भी उमड़ती है। अकीदतन लोग ऊंट का खून और गोश्त भी तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।



ईद-उल-अजहा या बकरीद
ईदुल अजहा यानि बकरीद ईद के बाद मुसलमानों का दूसरा बड़ा त्योहार है। यह त्योहार है कुर्बानी का, बकरीद के दिन ही हज के फरायज भी अदा किये जाते हैं। इस्लाम के पांच फर्ज माने गए हैं, जिनमें से हज सूची में सबसे आखिर में आता है। मुसलमानों के लिए अपनी जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी है। इसी दिन कुर्बानी के जज्बे का इजहार भी किया जाता है। यही बकरीद के त्योहार की पहचान है। इस्लाम में कुर्बानी यानि बलिदान की बहुत ही ज्यदा अहमियत है।



बेटे की कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटे थे हजरत इब्राहीम
मुफ्ती हारून रशीद नक्शबंदी के मुताबिक हजरत इब्राहीम ने अल्लाह अल्लाह के आदेश के बाद राह-ए-खुदा में अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का फैसला लिया। उनके लिये सबसे प्यारी चीज बेटे हजरत इस्माईल ही थे, सो उन्होंने हजरत इस्माइल को ही अल्लाह की राह में कुर्बान करने की कोशिश की। पर अल्लाह को सिर्फ उनका इम्तिहान लेना था, सो ठीक गर्दन पर छुरी चलने के ठीक पहले बेटे इस्माईल की जगह एक दुम्बा आ गया और तभी से कुर्बानी की रस्म चल पड़ी।


कुर्बानी का मजलब हिफाजत भी
उन्होंने बताया कि कुर्बानी एक मतलब हिफाजत करना भी है। यानि देश के लिये जब कुर्बानी दी जाती है तो वह उसके हिफाजत के लिये होती है। और हर मुसलमान अपने देश, परिवार, समाज, शहर और पड़ोसियों की हिफाजत के लिये हर कुर्बानी देने को तैयार रहे।



कुर्बानी में गरीबों का रखा जाता है खास खयाल
ईद-उल-अजहा में गरीबों और मजलूमों का खास ख्याल रखा जाता है। इसी लिये हुक्म है कि कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किये जाएं। दो हिस्से जरूरतमंदों को बांट दिये जाएं और एक हिस्सा ही खुद के लिये रखा जाय। कुर्बानी उसी पर फर्ज है जो साहब-ए-निसाब यानि इस्लामिक आधार पर तय मानक को पूरा करता हो और हज करने के लिये भी पहले अपने फरायज पूरे करने और कर्ज उतारने का हुक्म है। इस्लाम सामाजिक दायित्वों को छोड़ने की पैरवी नहीं करता।

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