
अश्विन बक्शी
इंदौर। नाड़ी देखकर मर्ज बताने वाले वैद्य अब हाइटेक हो गए हैं। अब मशीनें नाड़ी देखकर मर्ज पकड़ने लगी है। इंदौर के अष्टांग आयुर्वेद महाविद्यालय के नाडी़ परीक्षण विभाग में नाडी़ तरंगिनी साफ्टवेयर के माध्यम से यह जांच हो रही है। आयुर्वेदिक दवाओं के साथ ही मरीज के मोबाइल पर 10 पेज का पीडीएफ भी भेजा जा रहा है। जिसमें मर्ज की प्रकृति सहित अन्य जानकारी व सुझाव भी दिए जा रहे हैं। एक साल पहले शुरू हुई इस सुविधा का लाभ अब हर माह 200 से 250 मरीज उठा रहे हैं।
भारतीय चिकित्सा राष्ट्रीय आयोग ने अप्रैल 2024 में सभी शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय में इस साॅफ्टवेयर से मरीजों की जांच के निर्देश दिए थे। इसमें नाडी़ की गति, रक्त संचार और शरीर की अन्य जैविक प्रक्रियाओं को समझा जा रहा है। कई बीमारियों का भी पता चल रहा है।
परंपरागत तरीके से ऐसे होती है जांच
परंपरागत तरीके में मरीज की नब्ज को चिकित्सक हाथ से महसूस करते हैं। जिसमें गति, लय और शरीर में होने वाले बदलावों को देखकर रोग का अनुमान लगाया जाता है। अनुभव की कमी या नाड़ी की स्थिति स्थिर न रहने से पूरी तरह समझने में दिक्कत हो सकती है।
ऊंचाई सहित बीएमआइ की भी हो रही गणना
मरीज के विभाग में पहुंचने पर उसकी ऊंचाई के साथ ही वजन भी किया जा रहा है। इसके आधार पर बॉडी मास इंडेक्स की गणना भी हो रही है। वहीं दिनचर्या के लिए 20 से अधिक सवाल पूछे जाते हैं। इसमें नींद न आना, सोने का समय, भोजन, तनाव, गुस्सा आदि सभी की जानकारी चिकित्सक ले रहे हैं।
फैक्ट फाइल –
– 2024 में जांच के लिए पहुंचे 576 मरीज।
– 2025 के दो माह में 250 मरीजों ने कराई जांच।
– 1 मिनट में 72 से 80 बार चलती है सामान्य व्यक्ति की नाड़ी।
– 3 तरह के दोष वात, पित्त व कफ का चल रहा पता।
– 10 रुपए के सरकारी खर्च पर उपलब्ध हो रही जांच।
केस 1 –
60 वर्षीय महिला एसिडिटी की समस्या लेकर विभाग में पहुंची। जहां उसकी ऊंचाई व वजन की जानकारी ली गई। नाड़ी परीक्षण के बाद बीएमआइ 36 पाइंट पाया गया जो ओवर वेट केटेगरी में आया। वहीं कफ वात प्रकृति सामने आई। इसके आधार पर मरीज को दिनचर्या, व्यायाम व आहार सहित आयुर्वेदिक दवाएं भी लिखी गई।
केस 2
– 67 वर्षीय एक महिला हाथ पैर के जोड़ में दर्द व अन्य समस्याओं के साथ पहुंची। उसकी ऊंचाई व वजन करने पर वह ओवर वेट केटेगरी में आई। वहीं कफ वात प्रकृति पाई गई। महिला को रोजाना सुबह टहलने, हल्का भोजन करने, समय पर सोने व तनाव न लेने को लेकर समझाइश दी गई। इसके साथ ही दवाएं भी लिखी गई।
एक साल से मशीन के माध्यम से नाडी़ परीक्षण प्रारंभ हुआ है। इस जांच के लिए पहले की तुलना में कई मरीज बढ़े हैं। जितने भी मरीज आ रहे हैं उन्हें उनकी प्रकृति के अनुसार पंचकर्म सहित अन्य थेरेपी भी दी जा रही है। मशीन से सटीक और वैज्ञानिक तरीके से मर्ज का पता चल रहा है।
डॉ. विमल अरोरा, प्रभारी रस शास्त्र विभाग, शासकीय अष्टांग आयुर्वेद महाविद्यालय इंदौर