
नई दिल्ली। एक शादीशुदा औरत के लिए हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार सोलह श्रृंगार की वस्तुएं बहुत महत्व रखती हैं। मेहंदी, चूड़ी, सिंदूर, बिंदी आदि चीजें विवाह के बाद स्त्रियों के सुहागिन होने का प्रतीक मानी जाती हैं। हिंदू धर्म में तरह-तरह की परंपरा और रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। महिलाएं अपने पति के सकुशल जीवन और दीर्घायु के लिए बहुत से व्रत उपवास करके देवी-देवताओं से प्रार्थना करती हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि जहां एक तरफ सुहागिन सोलह-श्रृंगार से सज-धज कर व्रत, पूजा आदि करती हैं वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा समुदाय भी है जहां पति के जीवित होने के बावजूद भी हर वर्ष महिलाओं को कुछ ही समय के लिए विधवाओं की तरह भेष धारण करना पड़ता है। आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन ऐसा अजब गजब रिवाज गछवाहा समुदाय में निभाया जाता है। इस समुदाय में काफी समय पहले से इस रिवाज को निभाया जा रहा है। ऐसा कहा जाता है कि अपने पति की सलामती के लिए यहां की महिलाएं ऐसा करती हैं।
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दरअसल मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले कछवाहा समुदाय के लोगों में आदमी साल में लगभग 5 महीने तक पेड़ों से ताड़ी उतारने का काम करते हैं। जो कि एक तरह का पेय पदार्थ होता है। यह ताड़ के पेड़ जिनसे ताड़ी नामक पेय पदार्थ निकाला जाता है वह काफी ऊंचे-ऊंचे होते हैं। और जरा सी भी गलती एक बड़ी दुर्घटना बन सकती है।
इसी वजह से यहां की महिलाएं जब उनके पति पेड़ से ताड़ी उतारते हैं, तो वह अपना सारा श्रृंगार निकाल कर अपनी कुलदेवी के सामने अर्पित कर देती हैं। तरकुलहा देवी की कुलदेवी के रूप में गछवाहा समुदाय में पूजा की जाती है। जब महिलाओं के प्रति पेड़ पर चढ़े हुए होते हैं तो वह अपने बिंदी सिंदूर चूड़ियां और बाकी का सारा श्रृंगार निकाल कर रख देती हैं। यहां तक की उस दौरान उनके चेहरे पर भी मायूसी छाई रहती है। इस रिवाज को निभा कर वहां की महिलाएं देवी से अपने पति के सकुशल वापस लौटने की प्रार्थना करती हैं।