
bandej design work
- चन्द्रकांता शर्मा
राजस्थान के निवासियों के खान-पान, रहन-सहन, पहन-पहनावा और तमाम हस्तशिल्प के कार्यों में उसकी अपनी एक मौलिकता है उसके पीछे है एक जीवंत संस्कृति का यथार्थपरक इतिहास। यहां का जन जीवन सहजता और सरलता के लिए जाना जाता रहा। महिलायें राजस्थानी लोक संस्कृति की वह मूल है-जिसके बिना यहां तीज-त्योहारों तथा पहन-पहनावे का कोई अर्थ नहीं रहा जाता है। यहां का चाहे सांगानेरी प्रिंट का कार्य हो, अथवा चूनरी या बन्धेज, इन सबके पीछे महिला समाज की एक खास संस्कृति जुड़ी हुई है।
राजस्थान में बंधेज विविध अंचलों में भिन्न भिन्न प्रकार रंग और बूटों में तैयार की जाती है। यही नहीं, इसके नाम भी दूसरे क्षेत्रों में अन्य नामों से जाने जाते हैं। शेखावटी में यह कार्य चिनौन पर होता है तो गुलाबी नगर में पचमीना व शिफोन पर बहुत ही कुशलता से किया जाता है। बन्धेज पर खास तौर पर बिन्दियों का ही तिलिम्स जमाए जाता है- अत: हम 'बिन्दी' अथवा 'बन्ध' के कारण जो कलात्मकता रूप ग्रहण करती है, उसे 'बन्धेज' कहा जाता है।
बन्धेज का मूल कार्य स्त्रियों द्वारा ही सम्पन्न किया जाता है। कपड़े की चार अथवा छ: तह करके कच्चे रंग के डिजाइन लकड़ी के छापों से कपड़े पर मांडे जाते हैं तथा कच्ची सिलाई करके कपड़ा रोका जाता है। लकड़ी से किये जाने वाले इस छापे के काम को 'लिखाई' तथा इसी प्रकार स्त्रियों द्वारा चुटकी से पकड़ कर जो सिलाई की जाती है, उसे 'बंधाई' कहा जाता है। 'बंधाई' के बाद कपड़ा रंगरेज के पास रंगाई के लिए जाता है और यह रंगाई अंत तक उसी रंग में होगी - जो रंगरेज ने उस पर चढादी है। इसके बाद चुटकी से बांधे गये 'बंध' काटे जाते हैं तथा पृष्ठ भूमि पर सफेद बिन्दियां निकल जाती है। इन सफेद स्थानों पर बाद में रूई के फोहों से दूसरे रंगों से रिपाई की जाती है। यह रंग कार्य स्त्रियों द्वारा ही किया जाता है।
रिपाई के बाद फिर से कपड़े पर पुन: बन्धेज बांधा जाता है - जो टीप करते समय रंग बिखर जाता है उसे काट कर सही किया जाता है। हाइड्रोसल्फेट से धुलाई के बाद ही यह अनावश्यक रंग साफ हो जाता है। इसके बाद उस वस्त्र की बन्धेज का खोल कर सुखा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त भी बन्धेज का कार्य किया जाता रहा है। परन्तु इससे रंगों का तालमेल सही रूप से कायम नहीं रह पाता है। पहले कच्चे रंग में कपड़े की एक रंग में रंगा, फिर सूख जाने के बाद उस पर कलफ किया जाता है। फिर डण्डों पर कपड़ा लपैट कर इसे सुखा लिया जाता है।
बाद में बु्रश से कपड़े को दूसरे रंग से रंगा जाता है - इसी तरह कपडे में आडे-तिरछे 'बांध' लगाकर कपड़े की बांध कर पचरंगा साफा बनाने के लिए बल देकर डण्डे की तरह तैयार कर लिया जाता है। फिर इसे मनचाहे रंगों में रंग कर 'बन्ध' खोल लिया जाता है, तो बहुरंगी कलात्मक डिजाईन उपर आती है। बन्धेज का कार्य वैसे तो शेखावटी, जोधपुर व दक्षिणी राजस्थान में अपने-अपने ढंग व कलात्मकता के साथ किया जाता है, परन्तु जयपुरी बन्धेज की अपनी एक शान है तथा गौरवशाली इतिहास भी है।
जिस सफाई में बिन्दियों के बूटों से आकृति उमरती है, वह इस कला की उत्कृष्टता की कथा अपने आप कह उठती है। हालांकि शेखावटी की बंधेज कला में बारीकी तथा फूल पत्रों की विविधता पाई जाती है और वह भी कला सौन्दर्य की दृष्टि से कम नहीं होती, परन्तु जयपुरी बंधेज का 'पचरंगा' साफा व 'मौठड़ा' इस हस्तशिल्प का अनुपम मौलिक उदाहरण है। जयपुर में तीन-चार हजार परिवार बंधेज कला में लगे हैं, परन्तु बिचौलियों की मुनाफाखोरी के कारण वे सही रूप में जीविकोपार्जन नहीं कर पाते है।
बन्धेज के काम में वनस्पति एवं नेपथौली के रंग काम में लिए जाते हैं। इन रंगों के बनाने की विधियां बड़ी जटिल है। रंगरेज इन्हें तैयार करने में बहुत मेहनत करते हैं। यही वजह है कि कुछ रंगों में खास तरह की गंध कपड़े के कायम रहने तक जाती है तथा वह इतना आकर्षक होता है कि उसकी छटा देखते ही बनती है। रंगों की बनाने की प्रक्रिया बाग में घण्टों तक लौटाने तथा बहुत सी वनस्पतियां डालने के बाद संपूर्ण होती है तब कहीं जाकर बन्धेज के रंग साडिय़ों व साफों में जान डाल पाते हैं। आज तक बन्धेज कार्य का निर्यात होता है, वह विदेशों में भी पसंद किया जाने लगा है, उसकी व्यावसायिक स्थिति मजबूत है। इस कारण ही यह कार्य लोकप्रिय हुआ है तथा व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर सका है।
बन्धेज की साडिय़ां जयपुर ही नहीं दूर दूर तक के लोग जो पर्यटन की दृष्टि से यहां आते हैं, खरीद कर ले जाते हैं तथा इसकी गणना जयपुरी तोहफों में भी की जाती है। राजस्थान की स्त्रियों तीज-त्यौहारों की परम्परा तथा मौसम के अनुसार वस्त्र पहनती हैं। सावन में लहरिया, चूनरी व मौठड़ा पहनना चाहती है तो दूसरे त्यौहारों पर गोटे के काम के अन्य वस्त्र इन विविधताओं के कारण ही यहां की संस्कृति में बन्धेज अभी भी अपना स्थान बनाये हुये है और वह चाव से पहना जाता है। बन्धेज कार्य की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि उसका पूरा निर्माण हाथों से होता है - तथा पूरी लगन से इसके कारीगर इसे चित्ताकर्षक बना पाते हैं।
राजस्थान के विविध अंचलों में अपने-अपने ढंग से बनने वाली इस बंधेज कला के कारीगरों की हालत बड़ी खराब है, वे बिचौलियों व पूंजीपति वर्ग की मनमानियों व शोषण के शिकार हैं। मिलावटी रंगों, पानी की कमी तथा महंगे धागों से इस कला को बताए रखना जटिल होता जा रहा है हालत यह है कि गलत रंगों के कारण कपड़े पर रंग फब नहीं पाते तथा बंधेज की चुनरी हव चित्ताकर्षक पहचान नहीं बना पाती जो कि विशुद्ध माल के कारण बन पाती है। इसके शिल्पियों को इसका हार्दिक दु:ख है इस कार्य में मूल्य रूप से महिलाएं कार्यरत हैं - जो घर में ही इस कार्य को सम्पन्न करती हैं।
महिलाओं के अतिरिक्त छोटे-छोटे बच्चे भी बाल्यकाल से इस व्यवसाय में लग कर घर में जीविकोपार्जन में मदद करते है। वजह पुरूष मूल्य रूप से बंधी साड़ी पर रंग चढाने का कार्य करते है। बिचौलिए तथा पूंजीपति मालिक वर्ग ही दिन दिन पनप रहा है तथा कारीगर मात्र जीवन निर्वाह कर पा रहा है। बन्धेज चुनरी साडिय़ों में एसिड रंगों का प्रयोग साड़ी अथवा साफे को सस्ता बनता है तो फरोसन रंगों के कारण वे महंगे बिकते हैं, क्योंकि फरोसन रंग पक्के व महंगे होते है, अत: एसिड रंगो की तुलना में फरोसन रंगों वाली चुनरियों का दाम दुगुना हो जाता है।
फिरोजिया गुलाबी जामुनी एवं नारंगी रंगों का प्रयोग इस काम में मुख्य रूप से होता है तथा इन साडिय़ों पर पचरंगा चुनरी- फूल अनारदाना लाडूवाली व जामनगरी चित्राकृतियां ही प्रमुख रूप से चिन्नित की जाती है - वैसे इस काम में कोई डिजाईन निश्चित नहीं है तथ कुछ भी बना दिया जाता है यह कारीगर की कुशलता पर भी निर्भर है कि वह कपड़े पर धागे को किस तरह आकर्षित स्वरूप दे पाता है। राजस्थान में भंयकर गरीबी व रोजगार के अभाव में कारीगर सस्ते मिल जाते हैं - जिसका लाभ सेठ साहूकार अपने हित में प्राप्त कर उनका शोषण करते हैं - तथा शिल्पी महज जीवनयापन से अधिक नहीं जुटा पाते।
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