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दक्षिण एशिया और हिन्द महासागर में चुनौती बनता चीन

चीन से निपटने के लिए भारत की दीर्घकालीन रणनीति जरूरी

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Sunil Sharma

Dec 17, 2017

Chinese army

chinese navy

- डॉ. लक्ष्मी

वर्तमान में चीन ने केवल थलीय सीमा पर ही रक्षा चुनौतियां नहीं उत्पन्न कर रखी हैं बल्कि वह भारत की सामुद्रिक घेराबन्दी करने में लगा हुआ है। चीन की रक्षा तैयारियों को देखते हुए भारतीय नौसेना को आक्रामक और प्रतिरक्षात्मक तौर पर मजबूत होना होगा। नौ दिसम्बर को श्रीलंका ने सामरिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण हंबनटोटा बन्दरगाह को औपचारिक रूप से चीन को सौंप दिया। इस तरह चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह पर अपना नियन्त्रण हासिल कर लिया है। इस बन्दरगाह का नियन्त्रण एक समझौते के तहत 99 वर्षों के लिए चीनी कम्पनियों को दे दिया गया है।

अब चीन की दो कम्पनियां हंबनटोटा इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप तथा हंबनटोटा इंटरनेशनल पोर्ट सर्विसेज इस बन्दरगाह का सारा कामकाज देखेंगी। इस बन्दरगाह को विकसित करने तथा कुछ अन्य परियोजनाओं के लिए चीन ने श्रीलंका को आठ अरब डॉलर अर्थात 51 हजार करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे का कहना है कि हिन्द महासागर में यह बन्दरगाह व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है और इससे होने वाली आय से चीन का कर्ज वापस किया जाएगा। इस बन्दरगाह के आसपास बनने वाला आर्थिक क्षेत्र और वहां होने वाले औद्योगीकरण से इलाके का विकास होगा।

श्रीलंका सरकार ने चीन की महत्वाकांक्षी ''वन बेल्ट वन रोड" परियोजना का हिस्सा बनने की घोषणा कर रखी है। यह भी उम्मीद की जा रही है कि चीन अपनी इस परियोजना के तहत इस बन्दरगाह का बड़़े पैमाने पर उपयोग कर सकता है। यहां से व्यापारिक गतिविधियों के अलावा सैन्य गतिविधियां भी संचालित की जा सकती हैं। दोनों देशों के इस समझौते से भारत की सुरक्षा चिन्ताएं बढ़ गई हैं। जब चीन की नौसेना इसका इस्तेमाल करेगी तो यह भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा।

ग्वादर बंदरगाह का संचालन चीन के हाथों में आने से अरब सागर में चीन के जहाजों की आवाजाही और चीनी दखल बढ़ जाएगा। इस बन्दरगाह के माध्यम से चीन का अफगानिस्तान व मध्य एशिया के सभी देशों से व्यापार सम्भव हो जाएगा जो भारत की सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा बन सकता है। ग्वादर बन्दरगाह पाकिस्तान के लिए बेहद सामरिक महत्व वाला बन्दरगाह है। भारत के पड़ोसी देश के बन्दरगाह पर चीन का नियन्त्रण चिन्ताजनक है। चीन इस क्षेत्र में पाकिस्तान से पश्चिमी चीन तक ऊर्जा और खाड़ी देशों से व्यापार का कॉरिडोर खोलना चाहता है।

यहां की सामरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही माकरात के ग्वादर बन्दरगाह नौ सैनिक अड्डे को अब अत्याधुनिक रूप में विकसित किया गया है। ग्वादर पाकिस्तान के दक्षिण पश्चिम भाग में बलूचिस्तान प्रान्त के अरब सागर का तटवर्ती शहर है। यह शहर 80 किलोमीटर की चौड़ी पट्टी पर स्थित है जिसे माकरात कहा जाता है। पूरी तरह से विकसित होने के बाद यह दुनिया के आधुनिकतम बन्दरगाहों में से एक बन गया है। यहां से मात्र 10 नॉटिकल मील की दूरी पर दुनिया का सबसे व्यस्ततम जल मार्ग है जहां से लगभग 200 जहाज प्रतिदिन गुजरते है।

चटगांव व हम्बनटोटा भारत के समुद्री तटों के अति निकट पड़ते हैं। चीन ग्वादर से जियोंग तक रेल मार्ग तैयार कर रहा है। चीन ने यहां से अपने देश के शिनचियांग प्रान्त को पाकिस्तान से जोडऩे के लिए बहुत पहले काराकोरम मार्ग बनाया गया था। चीन द्वारा अब इस हाईवे का विस्तार किया जा चुका है। उपर्युक्त सभी मार्गों से चीन बलूचिस्तान के ग्वादर, पासनी एवं ओइमरा में स्थित नौ सैनिक अड्डों पर जरूरी सैनिक साजो-सामान, कार्गो व तेल टैंकर मात्र 48 घंटों में पहुंचाने में सक्षम हो गया है।

इस बन्दरगाह का आर्थिक व सामरिक रूप से विशेष महत्व है। इसीलिए चीन द्वारा परमाणु पनडुब्बियों, अत्याधुनिक जलयानों व मिसाइलों की तैनाती यहां पर की जा रही है। यहां से चीन अरब सागर के माध्यम से हिन्द महासागर में प्रवेश करके भारत को चुनौती प्रस्तुत कर सकेगा। ग्वादर नौ सैनिक अड्डे पर पाकिस्तान की नौ सेना भी महफूज रह सकेगी। भारत के लिए चिन्तनीय स्थिति यह है कि इस सामरिक महत्व वाले स्थान पर भारतीय नौसेना व थल सेना की पहुंच आसान नहीं होगी तथा पहाड़ी इलाका होने के कारण भारतीय वायु सेना भी यहां पर हवाई हमले नहीं कर सकेगी।

हिन्द महासागर में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए चीन ने म्यांमार को अपना दोस्त बनाकर उससे सैन्य सबन्ध बढ़ा लिए हैं। चीन, म्यांमार को परमाणु व मिसाइल क्षेत्र में सहयोग प्रदान कर रहा है। चीन ने म्यांमार के द्वीपों पर नौ सनिक सुविधाएं बढ़ा रखीं हैं जिससे हिन्द महासागर में भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकी। म्यांमार के हांगई द्वीप पर राडार व सोनार जैसी संचार सुविधाओं का स्थापित किया जाना चीन की ही देन है। म्यांमार के क्याकप्यू में भी चीन बन्दरगाह बना रहा है और थिलावा बन्दरगाह पर भी चीन का आवागमन है। यहां के सितवे बन्दरगाह पर चीन एक तेल व गैस पाइप बना रहा है जिससे वह इसका लाभ उठा सके।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोको द्वीप पर चीन अपनी ताकत बढ़ाकर आधुनिक नौ सैनिक सुविधाएं स्थापित कर चुका है। सैन्य सहयोग सुरक्षित रखने और समर्थन के लिए मालदीव व मारीशस के साथ चीन के बेहतर सम्बन्ध बन चुके हैं। मालदीव ने चीन को मराओ द्वीप लीज पर दे रखा है। चीन इसका उपयोग निगरानी अड्डे के रूप में कर रहा है। इसके अलावा चीन बांगलादेश के चटगांव बन्दरगाह का विस्तार कर रहा है। बांग्लादश का अधिकाश व्यापार यहीं से होता है। चीनी युद्धपोतों का आवागमन यहां पर होता रहता है।

चीन जिबूती, ओमान व यमन जैसे देशों के बन्दरगाहों का इस्तेमाल अपने लिए करने हेतु ताकत बढ़ा चुका है। चीन हिन्द महासागर के सेशेल्स द्वीप पर अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा खोल चुका है जिससे उसकी नौसेना को संसाधनों की आवश्यक आपूर्ति और अन्य सुविधाएं आसानी से मुहैया कराई जा सकें। इस उद्देश्य के लिए चीन ने सेशेल्स को दो वाई-12 सर्विलांस एयरक्राफ्ट उपलब्ध करवा रखें हैं। सैन्य अड्डे खोलना चीन की सामुद्रिक शक्ति बढ़ाने का एक हिस्सा है।

इस सैन्य अड्डे की मदद से सेशेल्स अथवा दूसरे देशों के बन्दरगाहों पर आपूर्ति और सहायता अभियानों में भी मदद पहुंचाई जा सकती है। चीन ने हिन्द महासागर में अपनी पैठ पहले से ही मजबूत कर ली है। यह स्थिति भारत के लिए खतरे का संकेत है। ये सैन्य ठिकाने भारत की घेराबन्दी के लिए पर्याप्त हैं और इनसे भारत को कड़ी चुनौती मिलेगी।