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आखिर क्यों दूर होते जा रहे हैं हम

सामंजस्य से ही होगा जीवन सार्थक

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Sunil Sharma

Oct 13, 2017

family

happy family girl

डॉ. विमलेश शर्मा

जीवन सूरज सा तपता है और सरकता, सुलगता रहता है सीली रात-सा...! कुछ कर्म अगर इस दिन और रात में सामंजस्य बिठाने के लिए संचित कर लिए जाए तो शायद जीवन सार्थक बन सकता है.. पर विडम्बना यही कि इसे समझता कोई नहीं। कहीं कुछ दहकता है, झुलसता है तो भीतर तक हूक उठती है... भले ही रीतिसिद्ध कह गए हों, 'दीरघ सांस ना लेत दुख'। पर कहाँ मानते हैं हम, आप। जरा सा कुछ हुआ नहीं कि गैस से रीतते गुब्बारे की मानिंद फुस्स। कोई नैतिकता से गिरता है तो मन भी धड़ाम सा गिर पड़ता है।

नहीं समझ आता कि लाख नजरअंदाज करते हुए भी हमारा परिवेश इतना क्यों असर डालता है। आखिर क्यों ईर्ष्या और स्वार्थ से हम एक दूसरे से इतने इतने दूर हो गए हैं कि प्रेम, स्नेह जैसे शब्द अपनी ऊष्मा का भाव खोते नज़र आ रहे हैं। जरा सा स्वार्थ पूरा नहीं हुआ तो किसी को दो बात झट-पट कह दी यह बिना जाने की कोई किस परिस्थिति से जूझ रहा होगा। अगर हम कुछ क्षण किसी को चुपचाप देखने का प्रयास करेंगें तो निश्चित ही उसकी हँसी के पीछे छुपा कोई गम नज़र आने लगेगा.. आपकी महानता तो इसी में है कि उस वक्त उसकी उस फीकी पड़ती हँसी को कुछ उजला कर दें.. या उसकी मुस्कराहट की स्निग्धता को महसूस करें।

यूँ कर लें तो सही मायने में शरद भीतर उतर आएगा और जीवन का ताप शिथिल हो शीतलता में बदल जाएगा।सभी धर्मों से मानवता ऊपर है, साहित्य में साथ चलने का, सहबंधुत्व का विश्वजनीन भाव है। नहीं समझ आता कि, फिर क्यों सब जगह, सभी प्रकल्पों में राजनीति और धड़ेबाजी का ही माहौल अधिक है...? क्या कहना, क्या सुनना, किसे क्या सुनाना, सभी जगह राजनीति। हालाँकि राजनीति का गूढ़ अर्थ है, पर हम गहरे में उतर कहाँ पाते हैं। सच ही कहा है किसी ने ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..!

- फेस बुक पेज से साभार