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लघु चित्र शैली में होली!

वसंत ऋतु में जिस मदनोत्सव का उल्लेख हमारे पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है, वह भी होली के स्वरूप से ही मिला-जुला है।

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Sunil Sharma

Mar 04, 2018

holi in painting

painting

- चन्द्रकान्ता शर्मा

होली भारतीय जन-जीवन का सबसे बड़ा और प्रिय त्यौहार रहा है। आदि संस्कृति से जुड़ा होने के कारण होली का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। वेद-पुराणों से लेकर रामायण व महाभारत में भी रंग पर्व का उल्लेख मिलता है। वसंत ऋतु में जिस मदनोत्सव का उल्लेख हमारे पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है, वह भी होली के स्वरूप से ही मिला-जुला है। अनेक आध्यात्मिक कला केन्द्रों तथा ग्रंथों में सचित्र वर्णन भी मिलता है तथा उनके साथ उनके सहयोगी पात्र भी इस उत्सव में सम्मिलित हुए हैं। इस प्राचीन लघु चित्र शैली में कांडड़ा तथा कष्मीरी लघु चित्र शैली भी बहुतायत से होली से जुड़ी चित्र परम्परा को जतलाती है।

प्राचीन मध्य भारत में चित्रकारों में एक समान रूपा शैली विकसित रही और उनके मुख्य पात्र राधा-कृष्ण ही रहे हैं। कुछेक चित्रों में नायक-नायिका को भी होली का आनंद लेते दर्षाया गया है। राजस्थान भी लघु चित्र शैली में सुविख्यात रहा है तथा यहाँ बंूदी, अलवर एवं बीकानेरी चित्र शैली भारतीय चिकला के प्राचीन इतिहास को एक समृद्धता प्रदान करती है। बूंदी शैली के चित्रों में अत्यंत बारीकी से चित्रात्मकता को अभिव्यक्ति दी गयी है तथा रंगों की विविधता के साथ-साथ उनका तालमेल भी बहुत ही सधा हुआ है। अलवर, बीकानेर एवं ढ़ंूढ़ाड़ चित्र शैलियाँ भी लधु चित्र शैली में अद्धितीय हैं तथा इनमें राधा-कृष्ण नायक-नायिकाओं को रंग खेलते हुए दर्षाया गया है।

इन लघु चित्र शैली के चित्रों में प्रासाद स्थलों में राधा-कृष्ण को होली बताया गया है। बीकानेरी शैली के एक चित्र के पृष्ठ में भव्य रंगों से सुसज्जित फलक है तथा राधा-कृष्ण गोपियों से घिरे हैं पास ही रंगों से भरे पात्र हैं। इनमें से गोपियाँ रंग पिचकारियों में भरती दिखायी गयी हैं। जबकि खड़ी हुई गोपियाँ मुट्ठी से गुलाल फेंकती दर्षायी गयी हैं कृष्ण ?ण की पोषाक प्राचीन राजा-महाराजाओं की जैसी है तथा उनका रंग श्याम वर्ण है। जबकि राधा लहगे, कंचुकी और औढ़नी की पोषाक में गोरवर्ण रूप में दिखलायी गई हैं। उसके केष हल्के से चेहरे पर आये हैं तथा वह हाथ में रंग से भरी पिचकारी लेकर कृष्ण की और उन्मुख है।

18वीं सदी के इन चित्रों में जिस मोहकता व सूक्षमता से रंग चित्रांकन मिलता है, वह अद्भुत है। ऊपर की और पार्ष्व में रंगों की छटा दर्षायी गयी है तथा गोपियों को नृत्य करते व संगीत गाने की मुद्रा में दिखलाया गया है। जो पोषाक उन्हें पहनायी गयी है उनमें इतनी नन्हीं-नन्हीं बुंदकी दी गई हैं कि वे बहुत ही लुभावनी लगती हैं। रंग संयोजन व चयन इतना सधा हुआ कि वह किसी भी कोठा से बिखराव नहीं ले पाता। सम्पूर्ण कला सौन्दर्य से सराबोर इन चित्रों में राजस्थानी जन-जीवन की छाप भी दिखलायी देती है। ये चित्र होली के सभी पहलुओं से आच्छादित हैं। प्राचीन प्रासादों में इनका अंकन दीवारों पर भी मिलता है। लेकिन ये भित्ति-चित्र अब इतिहास के पृष्ठों में सिमट रहे हैं तथा इनकी कापी कार्य ही देखने को मिलता है।

इन मूल चित्रों के सामने ये कापियाँ अत्यंत हल्की हैं तथा स्वाभाविकता से दूर है। उन रंगों की आभा वर्तमान रंगों में फीकी है तथा चमक भी क्षीण है। अलवर शैली में 19वीं शताब्दी के एक चित्र में भी राधा-कृष्ण को होली खेलते दिखलाया गया है। इस चित्र में खुले आसमान के नीचे परिवेष पतिस्थापित किया गया है। पृष्ठ में प्रासाद-उपवन की दीवारें दिखायी देती हैं। इस चित्र में रंगों के बादल उभारे गये हैं। इनमें भी गोपियाँ नृत्य करती तथा गाती दिखायी देती हैं। ये गोपियाँ आपस में बतियाती तथा होली खेलने को आतुर लगती है। राधा-कृष्ण गोपियों के मध्य हैं तथा रंग-गुलाल भरे दिखाये गये हैं। चित्र निर्माण में फलक इतना भव्य व लुभावना है कि वह दूर तक देखा जा सकता है। इस चित्र में भी राधा को पारम्परिक गोरवर्ण एवं कृष्ण को श्याम वर्ण प्रदान किया गया है, इस चित्र के चारों और लाल रंग में बेल-बूटे व पत्तियों को इतने भक रूप में गूंथा गया है कि देखते रहने पर भी मन नहीं थकता।

इस चित्र में भी इतनी बारिकियाँ हैं कि होली का केंद्रीय भाव चित्र में मनोयोग से चित्रित हुआ है। राधा-कृष्ण एक-दूसरे को नेत्रों से देख रहे हैं तथा प्रणय भाव की गहराई जतलायी गई है। अलवर शैली के अन्य लघु चित्रों में भी नायक-नायिकाओं को रंग खेलते बताया गया है। होली कृष्ण के साथ आदि जुड़ाव होने के चित्रकारों ने कृष्ण की लीलाओं को अभिव्यक्ति दी है। राजस्थान की लघु शैलियों में राधा-कृष्ण को आधार बनाकर संयोग-वियोग तथा ऋतु वर्णन को भी दर्षाया गया है।

आज भी प्रतिवर्ष लाखों चित्र कापी करके बनाये जाते हैं तथा बड़े-बड़े एम्पोरियमों के माध्यम से विदेषों को बेचे जा रहे हैं। हालांकि इससे लघु चित्र शैली की मोलिकता छिन्न-भिन्न हो रही है तथा भारतीय चित्रकला का व्यावसायीकरण विकृत स्वरूप ग्रहण कर रहा है। लेकिन होली को चित्रित करने वाले अनेक चित्रों में शालीन भाव का निरूपण करने में यहाँ के चित्रकारों ने कमी नहीं छोड़ी है। लघु चित्र शैली का स्वरूप हिन्दू राजाओं के शासनकाल के अलावा मुगल शैली में भी परिलक्षित है तथा तत्कालीन परिवेष तथा चित्रकारी को प्रमुखता मिली है। राज्याश्रित होने से इन चित्रों में रागात्मक पेम को प्रधानता मिली है तथा उनमें मनोरंजन का षिष्ट स्वरूप अंकित किया गया है।