
dalit violence
गुजरात में साबरकांठा जिले में एक दलित युवक की मूंछे जबरन साफ कराने का मामला बेहद चिंताजनक है। चिंताजनक इसलिए क्योंकि आज के सभ्य और शिक्षित होते जा रहे समाज में इस तरह की घटनाएं सामाजिक तनाव को बढ़ा रही हैं। बात अकेले गुजरात की नहीं, पूरे देश में दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के साथ इस तरह के उत्पीडऩ की वारदातें राजनीतिक रूप लेती जा रही हैं। आश्चर्य की बात ये कि तमाम राजनीतिक दल भी ऐसी घटनाओं को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से ही देखने लगे हैं।
उत्पीडऩ की ऐसी घटनाएं पहले भी होती थीं लेकिन उसे आपराधिक नजरिए से ही देखा जाता था। समाज में जैसे-जैसे मीडिया की भूमिका बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे ऐसी वारदातों का देखने का नजरिया भी बदलता जा रहा है। एक दशक पहले तक दलित उत्पीडऩ की घटनाएं उत्तरप्रदेश और बिहार में ही देखने-सुनने को मिलती थी। लेकिन धीरे-धीरे सभी राज्यों में इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के २०१६ के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं।
दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार के ४० फीसदी मामले अकेले उत्तरप्रदेश और बिहार में दर्ज होते हैं। पहले ये घटनाएं अधिकांशत ग्रामीण इलाकों में होती थी लेकिन अब शहरी इलाके भी इनकी चपेट में आने लगे हैं। गुजरात के साबरकांठा में एक दलित युवक की मूंछें साफ कराने का मामला सामाजिक भेदभाव की परिणति ही माना जाएगा। एक समुदाय के आठ लोगों ने पिटाई के बाद दलित युवक की मूछें साफ कर दी। इन युवकों की शिकायत थी कि दलित युवक रौबीली मूंछें कैसे रख सकता है? रौबीली मूंछें रखने का अधिकार ऊंची जाति के लोगों को किसने दिया?
आश्चर्य तब होता है जब इस तरह की घटनाओं में शिक्षित समाज की भागीदारी नजर आती है। देश इक्कीसवीं सदी में चल रहा है। दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे दौर में इन घटनाओं को स्थान क्यों दिया जाए? सरकारों को चाहिए कि इस तरह की वारदातों में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे। ताकि समाज में तनाव पैदा ना हो। दलित उत्पीडऩ के विरोध में पिछले दिनों गुजरात में हुई हिंसक वारदातों को चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। समय है जब हम संभल सकते हैं। नफरत की आग बड़ा नुकसान भी करा सकती है।

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