
teenager students
- चन्द्रकान्ता शर्मा
युवावस्था से कहीं ज्यादा नाजुक होती है किशोरावस्था। यह फिसलन की उम्र है। कच्ची माटी को जिस तरह मनचाहा आकार दिया जा सकता है। ठीक उसी तरह से यह उम्र बालक के बनने-बिगडऩे की होती है। किशोरावस्था की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस समय उनके रहन-सहन, खान-पान तथा सोहबत-संगत की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना अपेक्षित हो जाता है। यह वह उम्र है, जिसमें बालक को 'अच्छे-बुरे' का ध्यान नहीं रहता।
आजकल के बच्चे टी.वी. व फिल्में देखते हैं, अत: उनके बुरे प्रभाव उनकी मानसिकता पर जल्दी प्रभाव डालने लगते हैं। अखबारों की हत्या, बलात्कार, खून, अपराधों की सनसनीखेज खबरें उसे उन्हीं रास्तों पर धकेलती है। इस उम्र में वह नहीं जानता कि भला-बुरा क्या है ? इसलिए बिना रोक-टोक तथा नियंत्रण के अभाव में वह बुरी बातें जल्दी अपनाने लगता है। यदि वह खराब सोहबत में पड़ गया तो संयुक्त रूप से किए जाने वाले अपराध शनै:- शनै: उसकी जीवन दिनचर्या के अंग बनने लगते हैं।
युवावस्था में प्रवेश करने पर यही अपराधवृत्ति और विकट होने लगती है तथा बालक के सुधरने के अवसर कम हो जाते हैं। यह सब होता है बालक की कम उम्र में पर्याप्त देखभाल तथा नियंत्रित करने की आदत के अभाव में। यदि बच्चे पर प्रारम्भ से ही ध्यान दिया जाए तो तेरह से सत्रह के मध्य की उम्र के कुप्रभाव उस पर असर नहीं डाल पाते।
खासतौर पर जब बच्चा बारह-तेरह वर्ष का होने लगता है, तो उसके शारीरिक एवं मासिक अवयवों में स्फर्ति, नवचेतना का ज्ञान तंतुओं का नूतन प्रस्फुटन होने लगता है। उसे दुनिया एक नए रूप में दिखती है एवं जीवन का नजरिया पूरी रंगीनियों के रूप में उभरने लगता है। उसे ऐश, आराम तथा सुविधाजनक जीवन की चाह लगती है। वह खान-पान, रहन-सहन, पहनावा तथा फैशन के प्रति आकृष्ट होने लगता है तथा माता-पिता के सामने अपनी दबी इच्छाएँ भी प्रकट करने लगती है।
वह चाहता है कि उसे नए-नए कपड़े पहनने को मिले, वह फिल्मों के नायकों की तरह ही दिखने लगे। इस मानसिकता को यदि संस्कारों का सही उपचार सही समय पर नहीं मिलता है तो वे विकृत होने लगती हैं तथा माता-पिता की उपेक्षा अथवा नियंत्रण के अभाव में परवान चढऩे लगती हैं। फिर उम्र का बाँध रोके नहीं रूकता तथा बच्चा पढ़ाई से मन हटाकर जीवन के नए चक्र में उलझता चला जाता है। यही वह समय होता है कि जब बच्चे को अपनी मनचाही चीजें पसंद आने लगती हैं।
विपरीत ***** के प्रति आकर्षण भी बच्चों में इसी उम्र में जगने लगता है। वह फिल्मों की रंगीनियाँ अपनी आँखों में छिपाए अपने लिए भी सपने बुनने लगता है। माता-पिता यदि इस समय बच्चे पर नियंत्रण नहीं करते तो फैशन तथ जीवन का यह नया अस-सास बहुत ही सघनता से मानस के केन्द्र-बिन्दु पर छा जाता है। इसी का दुष्परिणाम उसे युवावस्था में पूरी तरह बिगडऩे के रूप में मिलता है। बुराई जल्दी सीखी जाती है। फिर जीवित के हर-क्षेत्र में आज बुराइयों का बोलबाला है। अच्छाइयाँ ढ़ूँढ़े नहीं मिलतीं, इसलिए कच्ची मानसिकता अपने नए अहसास में इन वृत्तियों को सहजता से स्वीकार करके अपनाने लगती है। अत: इस अवस्था में अभिभावकों का कत्र्तव्य हो जाता है कि वे अपने व्यस्त जीवन क्षणों में से चन्द क्षण रोज अपने बच्चे के लिए निकालें।
रोज उससे बात करें। संस्कारशील बनने की प्रेरणा दें। बच्चों को महापुरूषों की जीवनियाँ सुनाएँ तथा पढऩे को दें तथा उसी के साथ पढऩे वाले अच्छे सुसभ्य बच्चों के उदाहरण दें। साथ ही बच्चे में स्वयं के अन्दर जो अच्छाइयाँ नजर आएँ उनकी प्रशंसा करें। ऐसा करने से बालक की मनोवृत्ति अच्छाई के प्रति आकृष्ट होगी और वह माता-पिता की नजर में अच्छा बनने की दिशा में पूरा प्रयत्न करेगा। कच्ची किशोरावस्था में बच्चे को अच्छे लक्षण सिखाएँगे तो वह अच्छा सुसभ्य, संस्कारवान तथा विनम्र नागरिक बनेगा एवं बुरी आदतों तथा संगत का शिकार नहीं होगा।
इन उम्र में ध्यान दे लिया जाए तो बालक के बिगडऩे का कोई सवाल ही नहीं होता, बल्कि आगे चलकर आप बच्चे पर गर्व कर सकेंगे। लोगों के लिए आपका बालक आदर्श बन सकेगा तथा वह महापुरूषों के जीवन रास्ते पर चलकर एक भला नागरिक ही बनेगा। यह बालक के स्वयं के, आपके तथा समाज एवं राष्ट्र के हित में है। यदि हमारे नागरिक ससंस्कृत हों तो देष तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ेगा और कोई कारण नहीं कि उनकी जवानी फिर कहीं भटक सके। इसलिए बालक की वृत्तियाँ जानने के लिए स्कूल, अध्यापक तथा उसके सहपाठियों के सम्पर्क में रहें तथा गलत सूचना मिलने पर उसे रोकें तथा सही रास्ते की ओर इंगित करें।
Published on:
11 Feb 2018 03:15 pm
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