18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बाल अपराध सबसे बड़ी चुनौती

भावुक मन को सम्बल की है जरुरत

2 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Feb 05, 2018

child crime

child crime

- स्वाति

आज के सामजिक चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती के रूप में बाल अपराध उभर कर सामने आ रहा है। विश्व स्तरीय यह समस्या दिनों दिन विकराल रूप धरे जा रहा है। बच्चों के मन की कोमलता और निश्छलता की जगह अनियंत्रित आवेश और आवेग लेते जा रहे हैं। बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं और जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बचपन जीवन चक्र से गायब होते जा रहा है। बदलती जीवन पद्धति और जीवन देखने के नज़रिये ने समाज में सोचने-समझने के तरीके को भी बदला है।

कारणों पर चाहे कितनी भी दलीलें पेश की जाए, सच्चाई यही है कि दिल को दहला देने वाली यह घटना हुई है और ऐसी घटनाएं हो रही हैं। इस बदलते दौर में पल-पल बदलते भावनाओं पर नियंत्रण की जरुरत है। बच्चों की मानसिकता समझने के लिए अभिभावकों को ज्यादा मेहनत करने की जरुरत है। छोटे-छोटे बच्चों के आचार-विचार, रहन-सहन, बोलचाल, व्यवहार को करीब से देखने और समझने की जरुरत है। ऐसे किसी भी व्यवहार को नज़रअंदाज़ नहीं करें जो कल अपराध का रूप ले सकती है।

बच्चों का हर बात में जिद्द करना, किसी भी कीमत पर अपनी बात मनवा लेना, बार-बार समझाए जाने पर भी जानबूझ कर बदमाशियों की पुनरावृति करना, सफाई से झूठ बोल देना, अपनी गलती दूसरे के सर मढ़ देना, ऐसी कुछ आदतें हैं जिन पर गौर करने की जरुरत है। बच्चे मिट्टी की लोंद हैं। वो जो कुछ करते हैं या सीखते हैं उसका इनपुट कहीं ना कहीं से मिलता है। अभिभावकों को अपने बात-व्यवहार पर भी ध्यान देने की जरुरत है। कई बार हमें लगता है कि 'बच्चे हैं भला क्या फर्क पड़ेगा या समझेंगे नहीं', मगर हकीकत इसके उलट होती है। भाषा और व्यवहार का संतुलन एक ऐसी सौगात है जिसे माता-पिता और घर के सभी बड़े सदस्य अपने घर के बच्चों को दे सकते हैं।

बच्चों को मनोरंजन के स्वस्थ साधन उपलब्ध कराये जाए। माता-पिता को चाहिए कि टीवी और मोबाइल में बच्चे क्या देख रहे हैं और क्या सीख रहे हैं, इस पर पूरी निगरानी रखें। अश्लील और हिंसक बातें किसी भी माध्यम से बच्चों के सामने नहीं आने चाहिए। उनकी समझ इतनी विकसित नहीं रहती कि वो इन सब बातों को सही और गलत के तराजू पर तौल कर तानुसार उचित व्यवहार कर सके। अपराध और नैतिक पतन में अंतर होता है। अपराध करने की स्तिथि में भी इन मासूमों को उचित मार्ग-दर्शन देकर इन्हें मुख्य धरा में वापस शामिल किया जा सकता है। वरना बढ़ते बाल अपराध और आगे चलकर इनका पूरी तरह से अपराधी बनने के आंकड़ें बहुत भयावह हैं।

छोटी-छोटी बातें जैसे अपनी चीजों को शेयर करना, छोटों की गलती माफ़ करना, बड़ों से जबान ना लड़ाना, साथ मिलकर खेलना-पढ़ना जैसी आदतें बचपन से ही डाली जाए तो कदाचित ऐसे अपराधों में कमी आए। नैतिक शिक्षा पुस्तकों से नहीं बल्कि व्यवहार में दी जाए। इसकी जिम्मेदारी घर, विद्यालय और समाज के रूप में हम सबकी है। हम सचेत नहीं हुए तो एक दिन बलात्कार जैसे हम ऐसे बाल अपराधों के भी अभ्यस्त हो जाएंगे और इसे नपुंसकता वाली मौन स्वीकृति दे देंगे। जरुरत है इन घटनाओं के प्रति जवाबदेही वाली संवेदनाओं की। सिर्फ भावुक होने से या उत्तेजित होने से समस्या का समाधान नहीं है।