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किस दिशा में जा रहे है बच्चे?

समय आ गया है कि हमे एक बार फिर से विचार करना होगा कि पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर हम अपने बच्चों को कौनसी खाई की तरफ धकेल रहे है।

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Sunil Sharma

Jan 19, 2018

indian school kids

indian school kids

- डॉ. शिल्पा जैन सुराणा

कुछ सालों पहले की बात है अखबार में हमने पढ़ा कि अमेरिका और पश्चिमी देशों में विद्यार्थियों में आपराधिक प्रवृत्तियों का ग्राफ दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। व्याख्याताओ का समूह इस बात पर चर्चा कर रहा था अंत मे निष्कर्ष ये निकला कि वहां की शिक्षा पद्ति में नैतिक शिक्षा का कोई स्थान नहीं औऱ वहाँ शिक्षा मात्र एक व्यवसाय है यह एक मुख्य कारण है कि वहाँ बच्चो में आपराधिक गतिविधियों में सलंग्न होने के अवसर बढ़ जाते है।

अचानक अखबार में एक खबर पढ़ी कि लखनऊ की एक स्कूल में फिर से एक छात्र पर चाकू से हमला हुआ, सच कहूँ तो एक बारगी रूह कांप गयी, प्रधुम्न हत्याकांड को अभी कुछ ही दिन हुए है अभी तो मन मे वो घाव भी नही भरा था कि इस घटना ने सोचने को विवश कर दिया आखिर ये बच्चे किस दिशा में जा रहे है?

समय आ गया है कि हमे एक बार फिर से विचार करना होगा कि पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर हम अपने बच्चों को कौनसी खाई की तरफ धकेल रहे है। आज हमारे यहां भी शिक्षण संस्थान मात्र व्यावसायिक संस्थान बन कर रह गए है।

गलती किसकी है क्या अभिभावक होने के नाते ये हमारा फ़र्ज़ नही बनता की हम इस बारे में विचार करे, आज हम अपने बच्चे को इंटरनैशनल स्कूल में भेजना पसंद करते है जहां बच्चे को स्विमिंग, हॉर्स राइडिंग, गेम्स या यूं कहें हर विधा में निपुण किया जाए। बच्चे एक से बढ़कर एक एक्टिविटी में लगे रहते है साथ मे उनका रिजल्ट भी हमे बिल्कुल बढ़िया चाहिए। 90 प्रतिशत से कम आना तो मानो पाप हो गया है। कही भी जाये तो हमारा मुख्य ध्येय रही होता है कि हम किस तरह से अपने बच्चों को सर्वगुणसम्पन्न कैसे बनाये। शायद ये बात सुनने में गलत लगे पर आज के अभिभावक अपने बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु समझते है, हमारा बच्चा ये, हमारा बच्चा वो.....और जो बिचारा इस रेस में नही भाग पा रहा है उसकी तो शामत आ जाती है, चाबुक के दम पर उसे भगाया जाता है कि बेटा चाहे कुछ भी हो भागना तो तो तुम्हे पड़ेगा ही।

बिचारे बच्चे कहाँ जाए, प्रेशर कुकर सरीखी हालत हो जाती है अपने अंदर की घुटन कहाँ निकाले। माँ बाप जिनसे बच्चा सबसे ज्यादा उम्मीद करता है वो ही उसके अंदर की तकलीफ नही समझते, बस भेड़चाल में बच्चे को धक्का दे देते है।

"शर्मा जी के बेटे को देखा हर सब्जेक्ट में 95 परसेंट नम्बर लाया है और तुम देखो, कुछ सीखो उसे, तुम्हे तो अपना बच्चा कहने में शर्म आती है।"

" क्या कहा 2nd आये हो जरूर तुमने मेहनत नही की होगी अच्छे से।"

ये सब तो बानगी है अगर इस मुद्दे पर बात करने लगे तो एक किताब लिखी जा सकती है। मेरा एक सवाल है कि कब तक हम अपने सपनो का बोझ इन मासूम कंधो पर लादे रहेंगे। क्या सोच रही होगी इन बच्चों की जिन्होंने एक तरह का खतरनाक कदम उठाया,मात्र पेरेंट्स टीचर मीटिंग से बचने के लिए, परीक्षाएं रदद् करवाने के लिए किसी की जान लेना उन्हें सही लगा।

आप अपने बच्चों को स्विमिंग सिखाये या न सिखाये, उन्हें हॉर्स राइडिंग सिखाये या न सिखाये, उन्हें ये जरूर सिखाये एक अच्छा इंसान कैसे बनना है, इतना भी न डराए की उन पर डर हावी हो जाये, क्या हुआ वो गिरे, क्या हुआ अगर वो फिसले उनके पीछे चट्टान बन कर हमेशा खड़े रहे, आज के स्कूलों में आपके बच्चों को वो पाठ नही सिखाया जाएगा, वहाँ से नैतिक शिक्षा विषय कब का आउटडेटेड हो चुका है तो ये जिम्मेदारी अभिभावकों की है कि वो अपने बच्चे को कुछ बनाये या न बनाये एक अच्छा इंसान जरूर बनाये।

जरूरी है कि इन घटनाओं को हम अखबार के पन्ने की खबर न समझे, बल्कि एक चेतावनी समझे, अपने बच्चे की खामोशी को पढ़ना सीखे, उस पर से अपनी उम्मीदों का बोझ हटा लें, काबिलियत सिर्फ मार्कशीट से नही आंकी जा सकती ये बात समझ ले, बच्चा जैसा भी है माँ बाप के लिए वो खास है उसे समझे। अगर आपने उसे अच्छे संस्कार दिए है तो वो मुश्किल परिस्थितियों में भी अपनी राह ढूंढ ही लेगा।