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सर्वस्वीकार्य हिन्दी को किसी दर्जे की जरुरत कहां!

हिन्दी की प्रभुता को देखते हुए हिन्दी के पैरोकारों को गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए

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Sunil Sharma

Jan 19, 2018

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- अतुल कौशिश, वरिष्ठ पत्रकार

राजनेताओं द्वारा गाहे-बगाहे हिन्दी को विवादों में घसीट लिया जाता है। पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बयान दिया कि वे चाहती हैं कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा का दर्जा मिले यानी वैश्विक भाषा। इस पर कांग्रेस नेता शशि थरूर के साथ ही कई अन्य नेताओं ने भी असहमति जताई। श्रीमती स्वराज ने सत्ताधारी भाजपा की विचारधारा के अनुसार ही यह प्रस्ताव रखा। भाजपा चाहती है कि हिन्दी को देश की एकमात्र भाषा घोषित कर दिया जाए जबकि पार्टी को भली भांति पता है कि देश के कई हिस्सों में इसका पुरजोर विरोध होगा, खास तौर पर तमिलनाडु में।

हिन्दी को लेकर लोगों की बढ़ती रुचि को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही देश में इसका जो स्थान है उसे भी नहीं नकारा जा सकता। हिन्दी आज एकमात्र ऐसी भाषा है जो देश भर में बोली जाती है। दो अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग आपस में हिन्दी में बात करते हैं। अंग्रेजी का प्रयोग केवल पढ़े-लिखे लोग ही करते देखे गए हैं। हिन्दी को औपचारिक तौर पर आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मांग से लोगों में आक्रोश उपजेगा और साथ ही ऐसी आशंकाएं जन्म लेंगी कि यह हिन्दी भाषी लोगों द्वारा क्षेत्रीय भाषा बोलने वालों को कमतर दिखाने की कोशिश है।

देश की अन्य 20 से अधिक क्षेत्रीय भाषाओं को दरकिनार करने की कोशिश करने वाले हिन्दी के महारथियों को सोचना होगा कि हिन्दी भाषी देश में त्रिभाषायी फार्मूला कहां गायब हो गया। त्रिभाषायी फार्मूला यानी मातृभाषा, हिन्दी और अंग्रेजी। अधिकतर भारतीय हिन्दी बोलते या समझते हैं। इसलिए हिन्दी की प्रभुता को देखते हुए हिन्दी के पैरोकारों को गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए, खास तौर पर तब जबकि उन क्षेत्रों में कोई भी हिन्दी के प्रवेश को चुनौती नहीं दे रहा हो। हिन्दी के प्रति इस तरह की लालसा देश के लिए ठीक नहीं है।

गनीमत है कि सुषमा स्वराज व शशि थरूर के बीच विवाद में अंग्रेजी का जिक्र नहीं हुआ। हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि उदारीकरण के दौर में अंग्रेजी की खिलाफत करने का कोई मतलब नहीं है। अंग्रेजी को बिना किसी औपचारिक घोषणा के एक मात्र अंतरराष्ट्रीय भाषा माना जाता है, जो विश्व भर में बोली जाती है। अंग्रेजी को विश्व की आधिकारिक भाषा घोषित करने का किसी भी प्रयास का मतलब होगा उन देशों को विरोध करने का मौका देना जो दूसरे देशों के साथ संवाद के लिए अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि जब अंग्रेजी को दुनिया की सार्वभौमिक भाषा का दर्जा मिला ही हुआ है तो हम कमतर दर्जे की मांग क्यों करें!