
Indian independence day
- स्वाति
''राष्ट्र सर्वस्व और राष्ट्रहित सर्वोपरि'' की भावना को चरितार्थ प्रमाणित करने वालों के अक्षुक्ष्ण त्याग के वंदन का दिन, स्वतंत्रता दिवस अपनी महति प्रकाश के साथ इस वर्ष भी पुनः द्वार पर है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि इसका स्वागत हम कैसे करते हैं? लोकतंत्र का महापर्व जिसकी पतित पावनी सुगंध यहां के रज-रज में व्याप्त है। परन्तु हम उसके पवित्रता का मान कहां तक रख पा रहे हैं? स्वतंत्रता के 72 साल बाद हमें स्वयं से यह प्रश्न जरूर पूछना चाहिए कि आज हम आज़ादी की थाती को निष्कलंकित, निर्विवाद और समूल प्रतिष्ठित रख पाने में कितने सार्थक और समर्थ सिद्ध हुए हैं?
स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर विद्यालयों में बस खाना-पूर्ति की जा रही है। 5 साल की भतीजी को सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर ''वे तू लौंग वे मैं लाची'' जैसे गाने पर नाचते-उछलते देख कलेजा मुंह को आ गया। कमोबेश हर जगह यही स्थिति है। कई स्कूलों में बच्चों को स्वतन्त्रता दिवस के मायने समझाने के बजाय बस इसे फ़िल्मी धुनों पर थिरकने का जरिया बना दिया गया है। साथ ही तैयारी के नाम पर पैसे भी ऐंठे जा रहे हैं। 2-3 देशभक्ति गीत और राष्ट्रगान बजा कर विद्यालय जैसी संस्थाएं अपने कर्तव्यों की खाना-पूर्ति करते दिखाई दे रहे हैं। क्या यही वास्तविक औचित्य है इस पर्व का? बच्चे 15 अगस्त तो जानते हैं परन्तु स्वतंत्रता दिवस नहीं! हाथ में छोटे-छोटे तिरंगे लिए बच्चे देखने में सुंदर लगते हैं। मगर अगले ही दिन कचड़े में पड़े इनके अम्बार मन कचोट देते हैं। बच्चों को क्या कहा जाए अगले दिन समस्त सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं के आगे पड़े कूड़ेदान में तिरंगा दिख ही जाएगा। अर्थहीन मुगालतों में स्वतंत्रता उलझ कर रह गई है। जब जड़ों को ही हम सींच नहीं पा रहे तो बढ़े वृक्ष से कैसे फल की उम्मीद रखेंगे? देश के ही एक हिस्से में सम्भवतः पुनः पाकिस्तानी झंडे के साथ अपने स्वायत्तता की चाह रखने वाले क्या वाकई स्वतंत्रता का अर्थ जान-समझ रहे हैं?
आज़ादी के सुबह के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले वीर आज कहीं से देश को देख पाते होंगे तो उन्हें कैसा लगता होगा? स्वार्थी सत्ता के सियासत में फंसे देश को देख उनपर क्या बीतती होगी? इन फड़कती भुजाओं और भड़कते प्रश्नों के भाव को युवा कवि कमल आग्नेय ने बड़े बेहतरीन ढंग से रखा है-
''नारियों के जेवर को, नर के कलेवर को,
नेता जी सुभाष जैसे तेवर को क्या मिला?
सूली पर झूली थी जवानी की कहानी तब
बलिदानी दुर्गा के देवर को क्या मिला?''
आज की युवा पीढ़ी सोशल साइट्स पर स्वतंत्रता दिवस मना ले रही है। व्हाट्स ऐप पर मैसेज फॉरवर्ड करके देश प्रेम का कोरम पूरा कर ले रही। इनमें से अधिकांश वही लोग हैं जो हर बात में देश की कमियों को निकालने के लिए सजग बैठे रहते हैं। किसी भी अपराध या बुराई में सिस्टम पर दोष मढ़ने को आतुर रहते हैं। स्वयं को हर तंत्र से इतर समझने वाले, देश हित में संदेशों का दौर चला देते हैं। देश में एकीकरण और कर्त्तव्यनिष्ठता के भाव का लोप सा हो गया है। देश को आज़ाद कराने में दिए गए बलिदान को सम्मान देने के अलावा हमें आज़ादी के असली अर्थ को समझना होगा। अभिव्यक्ति के आज़ादी का सीमांकन करना सीखना होगा।
विचार में विरोध होना अलग बात है मगर स्वयं को सर्वेसर्वा और सर्वानीतिसम्पन्न सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान और चीन जैसे देशों का पक्षधर बनना बंद करना होगा। बलात भी अकारण निज देश के कमियों की दुदुंभी बजाने वाले को रोकना होगा। देश में जबरन भय का माहौल बनाकर दूसरों को डराना बन्द करना होगा। स्वयं को बारम्बार दबा-कुचला प्रामाणित कर विक्टिम कार्ड खेलना भी बंद करना होगा। राष्ट्र हित में दलगत राजनीति को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के तलवे चाटने से रोकना होगा। शायद हम तभी इस स्वतंत्रता की लाज बचाये रख पाएंगे। वरना अर्थहीन, भावहीन और कर्तव्यविहीन स्वतंत्रता का क्या औचित्य है?
‘’वो चंदन भी क्या चन्दन है जो अपना वन महका ना सका। वो जीवन भी क्या जीवन है जो काम देश के आ ना सका। ’’ यह मात्र कविता की पंक्तियाँ नहीं हैं बल्कि आज की परिस्तिथियों में देश के लिए अत्यन्त आवश्यक भाव हैं जिसका वास्तविक पटल पर क्रियान्वयन जरुरी है। इस माटी ने अनेक सपूत खोकर स्वतंत्रता पाई है। इस माटी में पुनः विश्वगुरु बनने की क्षमता भी है। सब भावों से ऊपर राष्ट्रभाव रखकर चलिए एक बार देश के लिए जीते हैं।

Published on:
13 Aug 2018 01:13 pm
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