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आस्था और भक्ति में सराबोर शिवभक्त कांवडिय़े देशभर में नजर आ रहे हैं। कांवडिय़ों की श्रद्धा और उत्साह देखते ही बनता है। लेकिन शिव-सेवा को निकले ये भक्त इन दिनों कुछ अप्रिय घटनाओं की वजह से सुर्खियों में हैं। दिल्ली में एक कार छू जाने भर से आक्रोशित कुछ कांवडिय़ों ने जिस तरह से एक महिला की कार तहस-नहस की, उसका वीडियो देखकर हर व्यक्ति सहम गया। बुलंदशहर में पुलिस वाहन पर हमला व ऐसी ही कुछ अन्य घटनाओं ने इन भक्ति-मार्गियों को लेकर देश में एक अलग तरह की चर्चा छेड़ दी है। दरअसल, इस मामले में पूरी बहस को सडक़ पर नमाज या अन्य धार्मिक क्रियाकलापों से तुलना क़र, या पार्टी विशेष से जोडक़र बांचना या पूरे धार्मिक आयोजन की उपहासपूर्ण विवेचना, सबसे दुखद और आपत्तिजनक हैं।
इन सभी घटनाओं को कुछ कांवडिय़ों की आपराधिक हरकत के रूप में ही लिया जाना चाहिए। अन्यथा वे हजारों कांवडिय़े जो आम जनता को कोई तकलीफ पहुंचाए बिना, चुपचाप अपनी आस्था की शक्ति से सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा कर रहे हैं, उनकी भावना के साथ अन्याय होगा। लेकिन कुछ कांवडिय़ों की अराजकता, इस पूरे धार्मिक कृत्य या भक्त समूहों को बदनाम न करने पाए, इसके उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। अधिकांश कांवड़ यात्रा किसी-न-किसी संगठन की ओर से आयोजित-पोषित होती हैं। ऐसे संगठनों के संरक्षक राजनीतिज्ञ, धर्मगुरु या अन्य समाजसेवी होते हैं। इन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि कांवड़ यात्रा पर जाने वाले भक्तों में समाज-विरोधी तत्व या नशेड़ी नहीं घुसने पाएं।
यात्रा मार्ग तय करने में भी यह सख्ती बरती जानी चाहिए कि भीड़भाड़ वाले बाजार या अन्य संकरे मार्गों पर उनके बड़े जुलूस व्यस्त ट्रैफिक के समय नहीं निकलें। बल्कि सभी धर्मों के प्रत्येक धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक आयोजन के लिए यह सख्ती से लागू करना चाहिए। आयोजकों से यह अपेक्षा भी कि ऐसी घटना होने पर अपने समूह में घुसे ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त रुख अपनाकर उन्हें खुद पुलिस के हवाले करें। क्या इन आयोजकों को यह देखकर अच्छा लगेगा कि बच्चे और महिलाएं, इन चंद अराजक तत्वों की वजह से हर कांवड़ यात्री को देखकर डरे सहमे रहें?जिस शिव को भोले भंडारी कहा जाता हो, क्या कुछ अराजक तत्वों की वजह से उसके भक्तों की ऐसी छवि बनना समाज-धर्म हित में है?
बहरहाल, कुछ कांवडिय़ों के उपद्रव को भीड़ की मानसिकता के नजरिए से समझने की जरूरत अवश्य है। यह नब्ज जरूर पकड़ी जानी चाहिए कि, ऐसा मानने वालों की तादाद क्यों बढ़ रही है, जो मान बैठे हैं कि जिसके पास ताकत होगी, भीड़ बल होगा, उसके लिए कोई नियम-कायदा नहीं, शासन-प्रशासन उनका गुलाम होगा और इंसाफ भी वे अपनी मर्जी के मुताबिक करेंगे! क्या यही वो मानसिकता नहीं, जो मॉब लिंचिंग कराती है, और उपद्रव भी? भीड़-बलियों के आगे जब तक हमारा समाज, राजनीति, पुलिस-प्रशासन-न्याय व्यवस्था बंधक और बेबस दिखेंगे, ऐसे तत्व हर धर्म, जाति, क्षेत्र, समूह में सिर उठाते रहेंगे।

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