
jammu kashmir
- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री
कश्मीर में भारतीय राज्य की राजनीतिक वैधता एक नाजुक धागे के सहारे लटकी हुई है। यह सहारा है ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ ऐक्सेशन’ नामक विलय का सौदा और 1949 में शेख अब्दुल्ला के साथ हुआ समझौता जिसके रास्ते अनुच्छेद 370 को अपनाया गया। यह इकलौता तरीका है जिसके जरिए भारतीय गणराज्य कश्मीर पर अपने अधिकार कानूनी तौर से थोपता है। इस प्रणाली को त्यागने का मतलब खुद को नापसंद किसी एक नीति भर को तिलांजलि देना नहीं है, बल्कि कश्मीर पर भारत के दावे के कानूनी आधार को ही छोड़ देना है। इसके बाद कुल मिलाकर दमन और ताकत का ही खेल बच जाता है।
एक जमीनी हकीकत यह भी है कि भारतीय राज्य का वादों, लोकतांत्रिक मूल्यों और भरोसे को तोडऩे का यहां एक लंबा अतीत रहा है। यहां जमीन पर हालात दमनकारी हैं। ऐसा लगता है गोया कश्मीर मौत के शिकंजे में हो। ऐसे में अनुच्छेद 35(ए) पर कहीं ज्यादा व्यवस्थित बहस की जरूरत पैदा हो जाती है, लेकिन 35(ए) को मौजूदा हालात में समाप्त करना आग से खेलना होगा। अगर ऐसा हुआ तो यह विश्वासघात की निर्णायक कार्रवाई होगी।
इस अनुच्छेद की अवस्थिति पर सुप्रीम कोर्ट अतीत में भी विचार कर चुका है। कम से कम दो महत्त्वपूर्ण मामलों में - पूरनलाल लखन पाल बनाम भारत के राष्ट्रपति (1962) और सम्पत प्रकाश बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य (1969) - अदालत विवाद का निपटारा कर चुकी थी, कि राष्ट्रपति के आदेश से बदलाव किए जा सकते हैं। एक मामला जो सीधे 35(ए) से नहीं जुड़ा है लेकिन राष्ट्रपति के आदेश की संवैधानिक अवस्थिति से जिसका लेना-देना है, वह फैसला भारतीय स्टेट बैंक बनाम संतोष गुप्ता के मामले में जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन और कुरियन जोसेफ ने सुनाया था।
प्रिवी पर्स से जुड़े मुकदमों में माधवराव सिंधिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में अदालत ने इस विचार की अभिपुष्टि की थी कि भारतीय राज्य को विभिन्न विलय के समझौतों में दी गई शर्तों का सम्मान करने की जरूरत है। इसी तरह जस्टिस चिनप्पा रेड्डी ने बचन लाल कलगोत्रा के मामले में राय दी थी कि जम्मू और कश्मीर के प्रशासन से जुड़े कानून बदलने का काम राजनीतिक प्रक्रिया के ही हवाले है, जज यह काम नहीं कर सकते। अदालत के समक्ष असम का उदाहरण है कि कैसे वहां राजनीतिक प्रक्रिया में न्यायिक शॉर्ट सर्किट बुरे परिणाम दे सकता है।
यदि निजी अधिकारों या आर्थिक एकीकरण के विशुद्ध नजरिए से देखें तो 35(ए) का मामला उतना स्पष्ट नहीं है। मोटे तौर पर याचिका में ही विरोध का एक बिंदु यह है कि निवासी और अनिवासी के बीच कोई भी भेदभाव अपने आप में भेदभावपूर्ण है। यह एक सामान्य दलील है। इससे न केवल 35(ए) कश्मीर के संदर्भ में अमान्य हो जाता है बल्कि मिजोरम, नगालैंड और हिमाचल में भी इसकी यही स्थिति बनती है। यह आपत्ति निवास संबंधी किसी भी अहर्ता को अमान्य करार देगी।
संभव है हम यही रास्ता अपनाना चाहें लेकिन इसका अर्थ 35(ए) से जुड़े एक और सिद्धांत को तिलांजलि देना होगा। कुछ परिस्थितियों में स्थानीय सांस्कृतिक विशिष्टता को बचाए रखने के लिहाज से कुछ बंदिशें जरूरी हो जाती हैं। विषम संघवाद और तमाम अन्य संरक्षणों के पीछे यही सिद्धांत काम करता है। चुनौती यह है कि इस सिद्धांत के प्रयोग का अत्यधिक राजनीतिकरण हो चुका है। कौन सी सांस्कृतिक विशिष्टताओं को बचाए रखना है, यह तय करने का काम सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ा है। इसीलिए इसके प्रयोग बेमेल हैं। यदि हम कश्मीर की जनांकिकीय स्थिति को बदलने के लिए तैयार हैं, जैसा कि बीजेपी के कई समर्थक दावा करते हैं, तो फिर असम में इस बदलाव को लेकर चिंता क्यों हो? यह सोचना कि इस सवाल का हल राजनीतिक समझौते के दायरे से बाहर है, मूर्खतापूर्ण होगा। इसीलिए संधियों, राजनीतिक समझौतों का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर आप इसमें सिद्धांत खोजेंगे तो तंत्र में कहीं और दबाव बढ़ जाएगा।
एक बार को मान लें कि 35(ए) वैध है यानी जम्मू और कश्मीर की विधानसभा निवासी की परिभाषा तय कर सकती है। तो क्या यह अधिकार बिना किसी बंदिश के पैदा होता है जहां अनुच्छेद 14 या 21 के तहत बुनियादी मानकों को पूरा करने की जरूरत ही नहीं रह जाती? एक आपत्ति 35(ए) को लेकर यह है कि निवासी की परिभाषा लैंगिक स्तर पर भेदभाव करने वाली है। इसीलिए यहां दो विकल्प बचते हैं। पहला, यह कह दिया जाए कि इन नाइंसाफियों का समाधान दूसरे रास्तों से संभव है। दूसरा विकल्प यह कह देना है कि भेदभाव का मसला सामने आने पर पूरी तरह राज्य की विधानसभा पर छोड़े बिना सुप्रीम कोर्ट 35(ए) को बनाए रख सकता है। संक्षेप में, प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों में संतुलन बैठाने के कई महीन तरीके हो सकते हैं।
अनुच्छेद 35(ए) कायम रखने के ऐतिहासिक, कानूनी और राजनीतिक तर्क हो सकते हैं, पर यह हमें मौजूदा गतिरोध से आगे बढक़र सोचने की भी सलाहियत देता है। नीति यही कहती है कि ध्रुवीकरण की आग को हवा न दी जाए, उस पर ठंडा पानी डाला जाए। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि कठोर राज्यसत्ता और विनाशक चरमपंथ के बीच झूल रहे कश्मीर की त्रासदी अभी जारी रहेगी।

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