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संवेदनशील फैसला

बेहतर यही होगा कि सरकार संवेदनाहीन आसान रास्ता नहीं, योजनाबद्ध समाधान खोजे और हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का मौका दे।

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Sunil Sharma

Aug 10, 2018

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भारत जैसे देश में, जहां भिक्षावृत्ति की एक पवित्र परंपरा रही हो, इसे अपराध कैसे माना जा सकता है? न सिर्फ धार्मिक बल्कि सामाजिक तौर पर भी इसकी पर्याप्त स्वीकृति रही है। प्राचीनकाल में पठन-पाठन का केंद्र रहे गुरुकुल अपनी आवश्यकताओं के लिए भिक्षावृत्ति पर ही निर्भर थे। जैन-बौद्ध ही नहीं, अन्य धर्मावलंबियों में भी साधु-संतों का जीविकोपार्जन भिक्षावृत्ति पर निर्भर रहा है और आज भी है। किसी परोपकारी कार्य के लिए समर्पित व्यक्ति यदि मांगकर अपनी न्यूनतम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तो उसके लिए भिक्षावृत्ति पवित्र ही है। ऐसे व्यक्ति को भिक्षा देना उक्त कार्य को समर्थन देना भी होता है। इसी स्वीकार्यता के तहत दान में प्राप्त रकम से आज तमाम राजनीतिक दल भी संचालित हैं। साथ ही यह भी सच है कि भिक्षावृत्ति हमेशा पवित्र नहीं होती। सिर्फ अपने लिए जीने वाला व्यक्ति जब लाचारी में भीख मांगता है तो समाज के लिए कलंक और व्यवस्था पर दाग बन जाता है। ऐसे दाग हटाने के लिए आत्म-सम्मान जगाने व दीर्घकालिक पुनर्वास योजनाओं को लागू करने की जरूरत है न कि भीख मांगने वाले को सजा देने की।

इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने बांबे भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम- 1959 को एनसीआर-दिल्ली के लिए असंवैधानिक करार देकर अच्छा किया है। अब इसके तहत पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर पाएगी। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कुछ बुनियादी सवाल उठाए हैं। उन्हें नजरअंदाज करना अपने आप को धोखा देना है। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि अपने नागरिकों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है। कोई व्यक्ति तभी भीख मांगता है, जब वह हर तरफ से लाचार हो जाता है। भीख मांगने पर किसी को गिरफ्तार करना उसके मूल अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने सरकार की उस मंशा पर कुठाराघात किया है जिसके तहत महानगरीय चमक-दमक को हर तरह के दाग से दूर रखने के लिए वह आसान रास्ता तलाश रही है। केंद्र व दिल्ली सरकार ने 2016 में कहा था कि भिक्षावृत्ति को अपराध के दायरे से बाहर लाने व उनके पुनर्वास के लिए कानून में संशोधन करना चाहती है जबकि, ऐसा हो नहीं सका।

दिल्ली- एनसीआर में करीब डेढ़ लाख भिखारी हैं। इनमें ज्यादातर दो जून की रोटी की तलाश में आए हैं और काम न मिलने से भीख मांगने को लाचार हो गए। इसमें कोई शक नहीं कि भिक्षावृत्ति के नाम पर कई आपराधिक गिरोह भी सक्रिय हैं। शातिर लोगों के लिए यह काली कमाई का एक और जरिया भर है जिसके तार बच्चों की तस्करी तक से भी जुड़े हैं। ऐसे मामलों से निबटने के लिए पहले से ही कानून मौजूद हैं। अपराधियों की पहचान कर सलाखों के पीछे पहुंचाने से पुलिस को किसी ने नहीं रोका है। सरकार यहां भी नाकाम है और आमतौर पर चौक-चौराहों पर आते-जाते लोगों से भीख मांगने के नाम पर आपराधिक हरकतें बढ़ गई हैं। बेहतर यही होगा कि सरकार संवेदनाहीन आसान रास्ता नहीं, योजनाबद्ध समाधान खोजे और हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का मौका दे।