
-प्रो. जे.एस. राजपूत, पदम्मश्री से सम्मानित शिक्षाविद्
स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को अमरीका के शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में जो शब्द सबसे पहले बोले, वे थे- 'अमरीका के मेरे बहनों और भाइयों!' ये शब्द अमर हो गए, इतना कुछ कह गए जिसे बड़े-बड़े ग्रंथ भी शायद न कह पाते। सभी श्रोता ये शब्द सुनकर खड़े हो गए और करतल ध्वनि करने लगे। ऐसा लग रहा था कि यह तालियां बंद ही नहीं होंगी। इस भाषण से स्वामी जी ने विश्व को दो बड़े संदेश दिए। पहला- संसार के सभी निवासी केवल एक ही परिवार निर्मित करते हैं और उस परिवार में सभी लोग भाई-बहन के रिश्ते से जुड़े हुए हैं। सभी समकक्ष हैं और कोई किसी से कमतर नहीं है। दूसरा- धर्म वही है जो यह तथ्य मानता है कि किसी को भी अपने धर्म को छोड़कर दूसरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी धर्म एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। केवल रास्ते भिन्न हैं। धर्म वही है जो किसी को अपने में आने को बाध्य न करे, बल्कि यदि संभव हो तो सहायता करे कि वह अपने धर्म का सही ढंग से पालन करे।
स्वामी जी के भाषण में दूसरी बार सबसे अधिक तालियां तब बजीं जब उन्होंने कहा कि मैं जिस धर्म का अनुयायी हूं, उसकी मूल भाषा संस्कृत में बहिष्कार जैसा कोई शब्द है ही नहीं। इस भाषण में जो भी कुछ कहा गया उसके लगभग हर वाक्य ने लोगों को विचार करने और विश्लेषण करने के लिए प्रेरित तो किया ही, बाध्य भी किया। हालांकि स्वामी जी भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से अत्यंत दुखी थे। वे जानते थे कि इसका मुख्य कारण भारतीयों का अपने ऊपर से विश्वास उठ जाना और अंग्रेजों की गुलामी और शोषण ही थे। अत: यह आवश्यक था कि देश के हर युवा को भविष्य के लिए देश के विकास को प्राथमिकता देने के लिए तैयार किया जाए। भारत की जाति प्रथा भी देश के पराभव के लिए बड़ी जिम्मेदार थी। जो धर्म मानवीय एकता की वैश्विकता का पक्षधर था, वह स्वयं अपने लोगों के साथ भेदभाव, छुआछूत जैसा घोर अन्याय करता था। आज युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देना है कि छोटे-छोटे राजनीतिक लक्ष्य सामने रखकर और दलगत लाभ के लिए अनेक नेतागण देश में जाति प्रथा को किसी ना किसी रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। वे जातीय समीकरणों के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं और यह कितनी आश्चर्यजनक स्थिति है कि यही लोग अपने को जाति प्रथा विरोधी भी कहते हैं।
भारत की भावी पीढ़ी को खुद को इन सबसे बचाना है, सामाजिक सद्भाव बढ़ाने की चुनौती को स्वीकार करना है। इन भावनाओं के साथ यदि व्यक्तित्व विकास होगा तो निश्चित रूप से देश में सामाजिक सद्भाव और पंथिक समरसता के साथ-साथ सेवा भावना बढ़ेगी और यही भविष्य में देश की प्रगति और विकास को गतिशीलता देगी और भारत अपना विश्व में अपेक्षित स्थान प्राप्त कर सकेगा।
Published on:
12 Jan 2026 01:38 pm
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