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प्रवास की कीमत और बुजुर्गों में अकेलेपन की मजबूरी

मीडिया रिपोर्टों में यह स्पष्ट हुआ है कि विदेश में बसे बच्चे वर्षों तक संवाद नहीं करते, आर्थिक या भावनात्मक सहयोग नहीं देते और कई बार संपत्ति हस्तांतरण के बाद संबंध लगभग समाप्त कर लेते हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 27, 2026

सोनम लववंशी - स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार

पासपोर्ट सामान्यत: एक औपचारिक दस्तावेज माना जाता है- पहचान का प्रमाण और सीमाओं को पार करने की अनुमति। हाल में राज्यसभा में उठे एक सुझाव ने इसे भावनाओं और नैतिक जिम्मेदारी के संदर्भ में ला खड़ा किया है। राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि जो संतान विदेश में बसकर अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं करती, उनके पासपोर्ट निरस्त करने पर विचार होना चाहिए। यह सुझाव किसी कानूनी प्रक्रिया से अधिक उस सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो तेजी से बदलते पारिवारिक ढांचे के बीच बुजुर्गों के जीवन में गहराती जा रही है। यह प्रश्न अब केवल परिवार का नहीं, समाज और राज्य की संवेदनशीलता का भी बन चुका है। दरअसल देश के अनेक शहरों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें बुजुर्ग माता-पिता ने अपने ही बच्चों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई।


मीडिया रिपोर्टों में यह स्पष्ट हुआ है कि विदेश में बसे बच्चे वर्षों तक संवाद नहीं करते, आर्थिक या भावनात्मक सहयोग नहीं देते और कई बार संपत्ति हस्तांतरण के बाद संबंध लगभग समाप्त कर लेते हैं। इन घटनाओं में सबसे अधिक पीड़ा इस बात की होती है कि माता-पिता की अपेक्षा धन से अधिक संवाद और उपस्थिति की होती है। यह अपेक्षा स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज में परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारे की सबसे बड़ी संरचना रहा है। भारत सरकार के अनुमानों के अनुसार देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 14 से 15 करोड़ के बीच है। आने वाले वर्षों में यह संख्या और तेजी से बढऩे की संभावना है। यह परिवर्तन केवल जनसंख्या का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के स्वरूप में बदलाव का संकेत है। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है, रोजगार के अवसर भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हो चुके हैं, साथ ही जीवन की गति पहले से अधिक व्यस्त हो गई है।


इस परिवर्तन के बीच बुजुर्गों का स्थान परिवार के केंद्र से हटकर किनारे की ओर खिसकता हुआ दिखाई देता है। यह स्थिति इस आवश्यकता की ओर संकेत करती है कि समाज और राज्य दोनों को वरिष्ठ नागरिकों के लिए अधिक मजबूत और संवेदनशील व्यवस्था विकसित करनी होगी। समय के साथ भौगोलिक दूरी बढ़ी, संवाद कम हुआ और संबंधों की गर्माहट प्रभावित हुई। तकनीक ने संपर्क को संभव बनाया है, फिर भी वह मानवीय उपस्थिति का विकल्प नहीं बन पाई है। राज्यसभा में उठी बहस केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़े एक गहरे प्रश्न का संकेत है। बुजुर्गों की देखभाल सुनिश्चित करना केवल पारिवारिक दायित्व नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसका समाधान कठोर दंड में नहीं, एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में है, जहां बुजुर्ग स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और जुड़ा हुआ महसूस कर सकें।