
momo challenge
- श्रुति अग्रवाल
मोमो चैलेंज से दो की मौत, " ये डर की दुनिया है...स्याह दुनिया। डरा रही है हमारे नौनिहालों को लेकिन इसकी जड़ ये खेल नहीं, हम हैं....हमने अपने बच्चों के सिर पर डर का आंचल रखा है। डराते हैं उन्हें पढ़ाई से, डराते हैं रिश्तों से...डराते हैं प्रतियोगिता से...डर-डर कर कब हमारे बच्चें इन स्याह दुनिया में खो जाते हैं पता ही नहीं चलता...चलिए एक कोशिश कीजिए डर के इस जाल को तोड़ने की....वादा कीजिए खुद से, डराने की जगह बच्चों को डर से जीतना सिखाएंगें।"
अपने आस-पास मुरझाता बचपन देख मन जार-जार रोने को करता है। सुबह बच्चों को चीखते हुए उठाया जा रहा है। उठो लाल अब आंखे खोलो...पानी लाईं हूं मुंह धो लो...बीती रात कमलदल फूले...उनके ऊपर भौंरे झूले....ये कहने वाली माएं अब विलुप्त हो गई हैं। जिंदगी दौड़ा-दौड़ा सा...भागा-भागा सा हो गई है। यह समस्या सिर्फ कामकाजी महिलाओं की या परिवार की नहीं। आस-पास घरेलू महिलाएं भी ना जाने किस सांतवे आसमान पर हैं, बच्चों को रोबोट बनाने पर तुली हैं। बच्चे अब माँ के गीले बालों-महकते आंचल से टपकती नेह की बूंदों के स्पर्श से नहीं जागते। मोबाइल का तीव्र आलार्म उन्हें जगाता है, डर की दुनिया में आपका स्वागत है, यह कह डराता है। फिर शुरू होता है जद्दोजहज का एक घंटा...दौड़ा-दौड़ा कर बच्चे को स्कूल भेजने के लिए तैयार किया जाता है। नाश्ते के नाम पर जेम-बटर से पुती हुई ब्रेड ठुंस दी जाती है। स्कूल बस में भागते हुए चढ़ाया जाता है।
जैसे ही बच्चे स्कूल को गए....राहत की फौरी सांस ली जाती है। उफ्फ...क्या बचपन और बचपना इतना नागवार है। क्या हर सुबह चिड़िया सी चहकती, घी की पुरियों सी महकती नहीं हो सकती। मैं जब स्कूल जाती थी...माँ रोज प्यार से दुलारते हुए उठाती। नया नाश्ता खिलाती...ब्रेड से तो सख्त नफरत थी पापा को। सुबह बासी हो तो दिन ताजा कैसे रहे। हम पुरियों की पुंगी मुंह में दबाते, हंसते-खिलखिलाते कुछ पहले ही रिक्शे पर पहुंच जाते थे। मैं यादों के गलियारों में अकसर भटकती हूं, अब वक्त हम सभी के सामने हैं, थोड़ा पीछे मुड़े अपना बचपन निहार लें। जी ले वो पल जब, बगल वाले अंकल के घर के कांच आपके गेंद ने तोड़े हों। किसी पेड़ पर चढ़ अमरूद-आम तोड़ने के चक्कर में डांट भी खाई हो, पैर भी तुड़वाया हो...क्या तब आप डरे थे, इस कदर की जान में हाथ धो बैठें। किसी बगीचे मालिक ने आपको भूतों का डर भी दिखाया होगा...फलां जगह पर मत जाओ कहकर आपकी अम्मा ने भी पोटली वाले बाबा की कहानी सुनाई होगी, जो बच्चा चोर है। क्या ये किस्सागोई आपको इस कदर डराती होगी कि आप जिंदगी का मोह छोड़ दें।
नहीं ना...मुझे याद है, मैंने भूत बनकर कईयों को डराया। कभी कछुए की पीठ पर काला रंग पोत, मोम्बत्ती जला प्लेनचिट खेल रहे दोस्तों के कमरों में छोड़ दिया तो कभी रेडियम लगे स्कैलेटन को पहन भूत बंगले की यादें ताजा की। रामसे ब्रदर्स की सारी फिल्में हम चैलेंज के साथ देखते थे...कब्रिस्तान के हाथ की कॉपी मिल गई थी, एक दोस्त को...फिर तो हमारी शैतान गैंग की बांछे खिल गई थीं...गरमी की छुट्टियां थीं...रोज किसी ना किसी को शिकार बनाया जाता था...हमारे दोस्त कुछ पल के लिए डरे जरूर लेकिन जिंदगी के लिए उनका इश्क गहरा हो गया। फिर अब क्या...रुकिए ...सोचिए...ठहरिए...हम अपने बच्चों की नींव अवसाद पर रख रहे हैं इसलिए इस तरह के भयावह खेल उन्हें मरने के लिए उकसा रहे हैं। जिंदगी के प्रति उनका अनुराग कम हो रहा है। मौत हर डर से बचने की रामबाण दवा लगने लगी है। हमने उन्हें वास्तविक दुनिया से दूर कर दिया है...वे आभासी दुनिया के तिलस्म में फंसते जा रहे हैं। यह फंतासी उन्हें नकारात्मक्ता की तरफ खींच रही है...रुकिए ना, बहुत देर हो जाए उससे पहले अपने बच्चों को आभासी दुनिया के तिलिस्म से बचाकर ले आईए।
इस तिलिस्म को कैसे तोड़े...
* ब्लू व्हेल के बाद मोमो चैलेंजे...इस तरह के चैलेंज खत्म ना होंगे। विकृत दिमाग इन्हें लगातार बनाते रहेंगे। आप अपने बच्चों को जिंदगी से इश्क करना सिखाइए। उन्हें डराने की जगह हर डर से जीतना सिखाइए। बताइए वर्चुअल दुनिया में तो क्या असल दुनिया में भी आपके रहते कोई उनका कुछ ना बिगाड़ पाएगा।
* उन्हें बात-बात पर यह मत कहिए...वो बेकार हैं...पढ़ाई का स्तर यही रहा तो भविष्य में कुछ ना कर पाएंगें। जिन बच्चों ने वर्तमान खुलकर जिया नहीं उनके ऊपर भविष्य का बेजा बोझ लादने से क्या फायदा।
* अपने बच्चों को वास्तविक दुनिया में रखिए, वर्चुअल दुनिया में फिल्टर लगाकर रखिए। जब तक आपका बच्चा 18 साल का नहीं हो जाता उसका ईमेल अपने लैपटॉप पर भी रखिए । चैक करते रहिए। बच्चा कहीं गलत तो नहीं जा रहा। यह आपका हक है। आप अभिभावक हैं। मैं बकायदा करती हूं....मेरे बेटे को भी पता है।
* बच्चे के व्हाट्सएप को चैक करते रहिए। मोबाइल को अनअटैंडेंट ना छोड़े। वैसे तो मोबाइल देना नहीं चाहिए यदि दे रहे हैं तो सैफ्टी फीचर्स ऑन करें।
* बच्चे कितना डाटा यूज कर रहे हैं, यह चैक करे, हिस्ट्री चैक करें। यदि बच्चा हिस्ट्री डिलिट करता है तो यह चेतावनी भरा अलार्म है। ध्यान रखें वह कुछ छिपा रहा है।
* सबसे जरूरी बात ब्लू व्हेल गेम हो या मोमो...इस तरह के खेल रात 12 से 3 बजे के बीच खेले जाते हैं। जब आपके दिमाग पर अवसाद हावी होता है। प्लीज-प्लीज रात को तो अपने बच्चों को टैब-मोबाइल-लैपटॉप से दूर रखिए। वह मोबाइल-इलेक्ट्रॉनिक्स के विकिरण से भी बचेगा साथ ही इस तरह के खेल से भी दूर होगा।
* अलार्म लगाने के लिए फिर मुड़िए पुरानी अलार्म क्लॉक की तरफ ....याद रखिए ओल्ड इज गोल्ड....। हमारी दादी-नानी ने एक समय में 10-10 बच्चे पाले थे, हमारे ऊपर तो एक या दो बच्चों की ही जिम्मेदारी है।
* सच जब किसी बच्चे की आत्महत्या की खबर सुनती हूं, मेरे अंदर की माँ बहुत घबराती है। आपको भी तो डर लगता होगा ना...इस डर के आगे हमारी नहीं हमारे बच्चों की जीत है...इस जीत को सुनिश्चित करने का दारोमदार हम अभिभावको के ऊपर ही है।
साभार - फेसबुक वाल से

Published on:
29 Aug 2018 04:32 pm
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