
indian women
- स्वाति
संसार के उद्गम का स्रोत आदि शक्ति है। माना जाता है इस विस्तृत, अपरिमित और अचंभित करने वाले संसार का निर्माण इसी आदि शक्ति से हुआ है। वैसे भी प्रकृति में सृजन क्षमता स्त्री को ही प्राप्त है। यह प्रकृति और आदि शक्ति स्त्री रूपा ही तो है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रज-रज में जिस ऊर्जा का संचार है, वह स्त्री रूपा है। नवरात्र का त्यौहार हमें हर साल इस बात का स्मरण कराता है। यह मात्र त्यौहार या पूजा नहीं है, बल्कि नारी शक्ति की महत्ता समझने का अवसर है। माँ दुर्गा के नव रूप, स्त्री के नौ कलाओं की परिचायक हैं। माँ भवानी अपने जिन रूपों में वंदनीय हैं, आज के स्त्री में भी वही सृजन, पालन और संहार की अभूतपूर्व शक्ति है। दुर्गा के नव रूप जिन आनंदों और शक्तियों से भरे हैं, आज की स्त्री उन्हीं शक्तियों और भावनाओं से सुसज्जित हैं।
शैलपुत्री से दृढ़ता सीखने को मिलता है। अन्याय के प्रति अपनों के समक्ष भी खड़े होने की दृढ़ता। सती रूप में पति के सम्मान के लिए स्वयं को भस्मीभूत करने वाली सती ने अपने पिता को क्षमा नहीं किया। पुनर्जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर शैलपुत्री कहलायी। आज संसार में स्त्रियों के प्रति अत्याचार, व्याभिचार और दुराचार बढ़ रहे हैं। स्त्रियों को इन सबका सामना करने के लिए स्वयं को सुदृढ़ करना होगा और स्त्रियाँ बहुत दृढ़ता से जीवन के हर उहा-पोह का सामना कर भी रही हैं।
ब्रह्मचारिणी रूप ने भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हज़ारों साल तक तपस्या की थी। जीर्ण-शीर्ण काया होने के बाद भी उनकी हिम्मत नहीं टूटी थी और अंत में मनचाहे वरदान की स्वामिनी बनी। यह संघर्ष आज की नारी के लिए प्रेरणादायी है। कर्मठ नारी अबला से सबला बनने के लिए प्रतिक्षण संघर्षशील है।
चंद्रघंटा वीरता का प्रतीक हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में स्त्रियों के लिए एक अनजाना भय तो दिखता है मगर वो आज इससे भयभीत होकर चुप नहीं बैठी है। 'अति सौम्य अति रौद्र' रूपा स्त्री जानती है कहां झुकना है और कहां झुकाना है।
कूष्माण्डा माँ को आदिशक्ति कहते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को रचने वाली यही हैं। वो सतयुग की स्त्री हो या कलियुग की, संसार को रचने की कला स्त्री में ही है। स्त्री की रचनात्मकता ही संसार को गतिमय और सुन्दर बनाता है। फिर चाहे मकान को घर बनाने की कला हो या संसार को श्रृंगार और कला से रचने की कला हो।
स्कंदमाता ज्ञान की देवी हैं। कहते हैं कि कालिदास रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत इन्हीं की कृपा से ही रच सके। समाज के आज हर क्षेत्र में नारी का आधिपत्य है। अपने ज्ञान, विवेक और चेतना से वह हर जगह झंडे गाड़ रही है।
कात्यायनी माँ से स्त्रियों को हर बात को जांचने-परखने का गुण मिला है। बिना शोध किये कोई भी निर्णय लेना या कोई राय बनाना गलत होता है। आज के दिन वो करियर या विवाह का निर्णय हो या परिवार में भागीदारी हो, स्त्रियां बहुत सोच समझ कर ही आगे बढ़ रही हैं।
कालरात्रि अतितायियों की संहारक है। अन्धकार में प्रकाश पुंज सी देदीप्यमान नक्षत्र हैं। नारी भी हर रूप में आशा और विश्वास की शक्ति पुंज है। बुराइयों के खिलाफ डंटने वाली है। आज तो कानून ने भी स्त्रियों को इतना सशक्त कर दिया है कि वो अत्याचार के प्रति सजग भी है और योद्धा भी है।
माँ महागौरी शांत हैं। हर उतार चढ़ाव में मन में शान्ति रख कर उपाय ढूंढने की कला स्त्रियों में होती है। घर- बाहर के दौड़ा- भागी में आप आज भी स्त्रियों को पुरुषों के अपेक्षाकृत अधिक शांत पायेंगे। शांत चित्त होकर अपने कार्यों के प्रति वो दत्त चित्त हैं।
सिद्धिदात्री की भूमिका दात्री की है। अब यह तो परम सत्य है कि स्त्री दात्री है। अपने परिवार और समाज के कल्याण के लिए स्त्री ने सिर्फ देना ही तो जाना और सीखा है। परहितकारी सिर्फ देना ही जानती हैं। गृहणी जितनी तपस्या से अपनी नींद और सुख को त्याग कर परिवार को सींचती है वह बारम्बार नमन योग्य है।
आज स्त्री सशक्त है। बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। संयम, ज्ञान, समझ, धैर्य, आत्मविश्वास और साहस से वह आगे बढ़ रही है। शक्ति का अर्थ सिर्फ शारीरिक बल नहीं होता है। शक्ति का अर्थ मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी है। नारी इस संतुलन के शिकार पर है जो अध्यात्म, माया और आधुनिकता का अद्भुत संयोजन है। इस समाज की भी जवाबदेही है कि नवरात्र में सिर्फ शक्ति की उपासना नहीं करें बल्कि स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना रखें।
भ्रूण हत्या, दहेज़, हिंसा, बलात्कार से मुक्त समाज ही माँ दुर्गा की असली पूजा होगी एवं भयमुक्त नारी ही माँ दुर्गा की असल आराधक होगी। इस बदलते और स्त्रियों के लिए और घातक होते दौर में स्त्री को अपने शक्ति रूप का स्मरण करना होगा। आज स्त्री ने हर रूप में स्वयं को साबित किया है। दकियानूसी सोच के कैद में फंसी स्त्री इन बंधनों से आज़ाद हो रही है।

Published on:
19 Sept 2017 02:53 pm
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