
happy life
- विमलेश शर्मा
ज़िन्दगी के ताने-बाने बड़े अज़ीब होते हैं। कभी सुलझाए नहीं सुलझते और कभी इतने सादा हो जाते हैं कि उनकी सादगी पर भी एक सवाल सा खड़ा हो जाता है। कई मोड़ों पर यही ज़िंदगी इतिहास सी लौट-लौट आती है तो कई ज़गह इतनी अनजान कि पता ही नहीं चलता कि यह जिंदगी ही है या कोई और अदेखा ख्वाब, या कि कोई दुःस्वप्न। जीवन में जाने कितने किरदार, कितने फलसफे रोज आँखों के आगे गुज़रते हैं कि वे इन गिरते-उठते पलों की कहानियों को जीवित करते से प्रतीत होते हैं। इन्हीं कहानियों में हर जीवन का रोजनामचा है जिन्हें कोई लेखक शिद्दत से महसूस करता है और अपने लिए कथा का आधार विषय के रूप में बनाता है।
आज के हिन्दी लेखन परिदृश्य पर नज़र डालें तो यह हड़बड़ी और महत्त्वाकांक्षी और अतिउत्साही लेखन के रूप में नज़र आता है। अपनी इच्छाओं का पुलिंदा लेकर लेखक बड़े उत्साह से रचनाधर्मिता की ओर अपना लगाव दर्शाते हैं और स्वयं सिद्ध लेखक बन जाते हैं पर इसी भीड़ में कश्मीरनामा,हसीनाबाद और ज़िंदगी 50-50, जैसी रचनाएँ अपने विषयों और लेखकीय प्रतिबद्धता को लेकर अलग छाप छोड़ती हैं। यह खुशी है कि एक ओर जहाँ सिर्फ़ लोकप्रियता के चलते रोमांस और हल्के-फुल्के विषयों पर लिखा जा रहा है, वहीं अनमोल अपनी भावनाओं के ज्वार से न केवल विषय के साथ जुड़ते हैं वहीं सामाजिक प्रतिबद्धता की लाइन को भी कुछ बड़ा कर देते हैं।
जीवन एक अनसुलझी पहेली है। यही जीवन किसी के लिए अभिशप्त तो किसी के लिए वरदान साबित होता है। यह समय की ही अनुकूलता है कि जीवन -अभिशप्तता अब रेखांकित, चिह्नित और शाब्दिक अभिव्यक्ति पाने लगी है। प्रकृति की एक सर्जना जिसे हम थर्ड जेन्डर की संज्ञा से नवाजते हैं भी इसी अभिशप्तता का क्रूर चेहरा है। इस अभिशप्तता की टीस इतनी गहरी है कि इसे पढ़कर तुरंत ही इससे संक्रमित हुआ जा सकता है। इसी टीस को राहतों की फुहारें देने की ही कोशिश है, ज़िंदगी 50-50।
- फेस बुक वाल से साभार
Published on:
6 Jun 2018, 4:16 PM IST
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