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प्लास्टिक का खतरा हर तरफ

भारत समुद्रों में सर्वाधिक प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वाले 20 देशों में चीन, दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, श्रीलंका, मिस्र, नाइजीरिया, बांग्लादेश के बाद 12वें स्थान पर है।

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Sunil Sharma

Jun 05, 2018

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- अजय कुमार झा, पर्यावरण कार्यकर्ता

वर्ष 1972 से हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस बार पर्यावरण दिवस पर भारत वैश्विक मेजबान है और संकल्प है दुनिया को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने का। पिछले वर्ष दिसंबर में राष्ट्रसंघ की तीसरी पर्यावरण एसेम्बली में 193 देशों ने विश्व को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने का संकल्प लिया गया था।

प्लास्टिक आज हमारे जीवन में अत्यंत उपयोगी वस्तु है और हम हर दिन प्लास्टिक का उपयोग कई तरह से करते हैं। सुबह उठते ही टूथब्रश और टूथपेस्ट से लेकर भोजन की पैकिंग, यातायात साधन, फोन, कंप्यूटर सभी चीजों में प्लास्टिक है। इसके बिना आज जीवन की परिकल्पना असंभव सी लगती है, लेकिन यह पर्यावरण के लिए घातक है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक से बनी अधिकांश वस्तुएं या तो पूर्णतया नष्ट नहीं होती हैं या इसमें 500 से 1000 वर्ष तक लग सकते हैं।

1950 से लेकर अब तक उत्पादित प्लास्टिक में सिर्फ 20 फीसदी ही या तो रीसाइकल किया गया है या बिजली बनाने में इस्तेमाल किया गया है। शेष हमारी धरती और समुद्रों को प्रदूषित कर रहा है। 60 प्रतिशत प्लास्टिक पदार्थ ऐसे हैं, जो सिर्फ एक बार इस्तेमाल के लिए बनाए जाते हैं, जैसे चाय/कॉफी के कप, पानी या अन्य पेय पदार्थ की बोतल और पॉलिथीन के थैले।

यह प्लास्टिक या तो बड़े लैण्डफिल का हिस्सा है या समुद्रों का। समुद्र में व्हेल, सील प्लास्टिक में फंसकर या उसे खा कर रोज मर रहे हैं। प्लास्टिक टूटकर माइक्रो प्लास्टिक यानी अत्यंत सूक्ष्म प्लास्टिक कणों में परिवर्तित होता है जो मछलियां खा लेती हैं और उनके माध्यम से यह प्लास्टिक हमारे भोजन चक्र में शामिल हो जाता है। प्लास्टिक के कप में गर्म पेय पीने से या प्लास्टिक की पानी की गर्म हुई बोतल में कई तरह के टॉक्सिन पैदा हो जाते हैं, जो कैंसर सहित कई घातक बीमारियां का कारण बनते हैं।

समुद्रों और नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो 2050 तक वहां जलचरों के बजाय प्लास्टिक अधिक मात्रा में पाया जाएगा। पॉलिथीन बैग और पानी व अन्य पेय पदार्थों की बोतलें सबसे बड़ी समस्या है। दुनियाभर में प्रति मिनट दस लाख पेय पदार्थ की बोतलें बेची जाती हैं और प्रतिवर्ष तकरीबन 480 बिलियन। चीन, इंडोनेशिया, अमरीका, थाईलैण्ड इत्यादि देश प्लास्टिक के इस्तेमाल और अपशिष्ट पैदा करने में सबसे आगे हैं। यूरोप के कई देश जैसे आयरलैंड, लक्समबर्ग, एस्तोनिया और जर्मनी में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का इस्तेमाल काफी अधिक है। इन अपशिष्टों में बड़ा हिस्सा पर्यटकों की देन भी है।

यूरोप के कई देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, डेनमार्क आदि ने प्लास्टिक पर सख्त नियम बनाए हैं। स्वीडन अब प्लास्टिक रीसाइकल करने पर जोर दे रहा है। अमेरिका के कई राज्य प्लास्टिक प्रदूषण में कमी ला रहे हैं। अफ्रीका के कुछ देश जैसे केन्या, रवांडा इत्यादि प्लास्टिक कचरा कम करने के लिए सख्त कानून लेकर आए हैं। चीन ने भी जनवरी 2018 में प्लास्टिक का आयात बंद करने का निर्णय लिया।

भारत समुद्रों में सर्वाधिक प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वाले 20 देशों में 12वें स्थान पर है। चीन, दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, श्रीलंका, मिस्र, नाइजीरिया, बांग्लादेश व दक्षिण अफ्रीका भारत से भी ऊपर हैं। समुद्रों में सर्वाधिक प्लास्टिक कचरा डालने वाली 20 नदियों में तीन सिंधु, ब्रह्मपुत्र और गंगा भारत की नदियां हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (2015) के अनुसार भारतीय शहरों में प्रतिदिन 15000 टन प्लास्टिक अपशिष्ट निकलता है, जिसमें से सिर्फ 9000 टन एकत्रित करके रिसाइकल किया जाता है। भारत सरकार ने 2016 में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स जारी कर प्लास्टिक के निर्माण, बिक्री, वितरण को विनियमित किया और 50 माइक्रोन से कम के प्लास्टिक बैग पर रोक लगाई, लेकिन इनका प्रभाव आंशिक रूप से ही दिखाई देता है।

प्लास्टिक प्रदूषण का समाधान मुश्किल है, परंतु असंभव नहीं है। कई संस्थाएं और कंपनियां कपड़े के थैलों की वकालत करती हैं, पर ध्यान रखना होगा कि पूरी दुनिया में तीन प्रतिशत खेती योग्य भूमि में ही कपास उगाई जाती है, जिसमें पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक का एक चौथाई भाग लगता है। एक किलोग्राम कपास पैदा करने में तकरीबन 5000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, कागज बायोडिग्रेडेबल है, लेकिन और उसके परिवहन में कई गुना ज्यादा ईंधन लगता है। रिसाइकल किए हुए कागज से बैग बनाने में कार्बन फुटप्रिंट कम किया जा सकता है।

विश्व को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करना सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। यह तभी संभव होगा जबकि इसका हर नागरिक भी अपनी जीवनशैली को प्लास्टिक मुक्त बनाने का संकल्प लेगा। उसे हर व्यावहारिक समाधान न केवल अपने जीवन में उतारना होगा, बल्कि अधिक से अधिक लोगों को उनके प्रति जागरूक करने का बीड़ा भी उठाना होगा।