27 अक्टूबर 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

तिब्बत-चीन सम्बन्ध पर विचार जरुरी

मध्य मार्ग की नीति से फायदा
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

•

image

Sunil Sharma

•

Updated: 17 Jun 2018, 3:43 PM IST

Dalai Lama

dalai lama in tibbet

- श्रुति अग्रवाल

चीन अधिकृत तिब्बत में तिब्बतियों को ही उनके 'धर्म और भाषा' के उपयोग से रोका जा रहा है जिसके कारण युवा जीवन जीने की पद्धति-धर्म और संस्कृति से दूर हो रहे हैं। इस तरह तिब्बत की संस्कृति तिब्बतियों के बीच ही लुप्त हो जाएगी। इसे बचाए रखने के लिए मध्य मार्ग की नीति को ही अपनाया जाना चाहिए। यह नीति तिब्बत और चीन दोनों ही देशों की लिए फायदेमंद रहेगी। अब हमें 14वें तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा द्वारा बनाई गई इस नीति को पूरे विश्व में फैलाना होगा। इस तथ्य पर आधारित था मध्यममार्ग नीति को लेकर आय़ोजित पहला अंतराष्ट्रीय मिडिल वे पॉलिसी सम्मेलन। 1974 में चीन-तिब्बत विवाद का कोई हल नहीं निकलते देख तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 'मिडिल वे अप्रोच' को अपनाया। जिसमें चीन से मध्यम मार्ग निकालने की अपील की गई थी।

इस मध्यममार्ग में कहा गया था कि 'तिब्बत चीन का भाग बनने के लिए तैयार है, उन्हें बस उनका धर्म औऱ भाषा सहेजने और अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की स्वतंत्रता दी जाए। मिडिल वे पॉलिसी को तिब्बती भाषा में उम्यालम कहते हैं'। इस पॉलिसी के अंदर तिब्बती संगठनों ने चीन की सरकार से आठ सूत्रीय मांग रखी है। जिसमें उनकी भाषा, कल्चर, धर्म, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, तिब्बत के प्राकृतिक स्त्रोतों का सही तरीके से दोहन, आम व्यक्तियों के स्वास्थ्य औऱ सुरक्षा की मांग की गई है। इस दृष्टिकोण को दलाईलामा ने यथार्थवादी दृष्टिकोण कहा है।

यथार्थवादी होने के बावजूद 40 साल से ज्यादा बीत चुके हैं, चीन ने तिब्बत की मांग को किसी तरह की तवज्जों नहीं दी है। अब इस मांग को विश्व के हर कोने तक पहुंचाने का बीड़ा तिब्बती युवकों ने उठाया है। जिसके तहत 26 मई से लेकर 31 मई तक धर्मशाला के टीपा सेंटर में इसे लेकर कार्यशालाएं रखी गईं। इस कार्यशाला में देश-विदेश से तिब्बत के युवाओं ने भाग लिया। तिब्बती समाज के बुजुर्ग सोशल वर्कर और इस अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के आर्गनाइजर धावा शेरिंग का कहना था कि लंबा वक्त बीत चुका है, अब हम अपने देश की बागड़ोर युवाओं के हाथ में सौंपना चाहते हैं। यदि अब हमने कुछ ना किया तो पर्शिया की तरह तिब्बत की संस्कृति का भी लुप्त हो सकती है। उसके संरक्षण का भार अब युवा कंधों पर डालना होगा। इसलिए हमने सम्मेलन के लिए अलग-अलग जगह से लोगों को बुलाया है।

सम्मेलन में देश-दुनिया से 9 अलग-अलग स्पीकर्स ने 600 तिब्बती युवाओं के सामने मिडिल-वे पॉलिसी के संबंध में अपने विचार रखे। इनमें दलाई लामा के सेकेट्री थेजम से लेकर तिब्बत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री सैमडोंग रिनपोचे भी शामिल थे। चायना के प्रोफेसर मिंग जिया भी इस सम्मेलन के स्पीकर्स में से एक थे। स्पीकर्स के अलावा भाग लेने वाले युवाओं में पत्रकार, शोधार्थी, लेखक आदि सम्मलित थे। जिनका दायित्व अब इस पॉलिसी को अपने-अपने क्षेत्रों में आम लोगों तक पहुंचाना है। जिससे सभी मिलकर चीन सरकार तक अपने तथ्य पहुंचा सकें।

इस सम्मेलन में भाग ले रहे युवा स्पीकर येशी दावा अभी पॉलेटिकल साइंस में पीएचडी की तैयारी कर रहे हैं। येशी 8 साल की उम्र में दो महीने का सफर कर धर्मशाला पहुंचे थे। येशी को छोड़कर उनका पूरा परिवार चीन अधिकृत तिब्बत में ही है। येशी का कहना है अब युवाओं के माध्यम से वे दलाई लामा की मध्यम मार्ग की नीति को पूरे विश्व में फैलाना चाहते हैं। इस सम्मेलन में भाग ले रहे सभी युवा बड़े विश्वविद्यालय और शहरों से जुड़े हुए हैं। सभी को समझाया है कि चीन के संविधान के अनुसार भी हमारा मध्यममार्ग पूरी तरह से सही है। यह सारी बातें चीन के संविधान में भी है। यदि हम हर जगह अपनी आवाज उठाएंगें तब ही इस नीति को लागू करवाने के लिए कुछ ठोस किया जा सकेगा। इस पूरी बैठक के बाद युवा, चीनी लेखक, पत्रकार,शोधार्थियों का प्रतिनिधि मंडल धर्मगुरु दलाई लामा से मिलने गया। दलाई लामा का कहना है कि विश्व के कई देशों की सरकारों ने मिडिल वे अप्रोच को समय-समय पर समर्थन दिया है। अब इसके पॉलिसी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है जिससे इसे अमली जामा पहनाया जा सके।

चीन अधिकृत तिब्बत में तिब्बतियों को ही उनके 'धर्म और भाषा' के उपयोग से रोका जा रहा है जिसके कारण युवा जीवन जीने की पद्धति-धर्म और संस्कृति से दूर हो रहे हैं। इस तरह तिब्बत की संस्कृति तिब्बतियों के बीच ही लुप्त हो जाएगी। इसे बचाए रखने के लिए मध्य मार्ग की नीति को ही अपनाया जाना चाहिए। यह नीति तिब्बत और चीन दोनों ही देशों की लिए फायदेमंद रहेगी। अब हमें 14वें तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा द्वारा बनाई गई इस नीति को पूरे विश्व में फैलाना होगा।