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स्त्रियां: संघर्ष का दस्तावेज

दमित स्त्री का वास्तविक गुनहगार आखिर कौन
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Sunil Sharma

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Jun 29, 2018

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अतीत से ही एक धारणा रही है कि स्त्री पैदा नहीं होती है अपितु बनाई जाती है। परिवार, समाज, रीति-रिवाज और धर्म शास्त्र मिलकर स्त्री की रचना करते हैं। ये पुरातन मान्यताएं स्त्री विकास में सदैव बाधक बनी हैं और कई बार इसकी जड़ें स्त्री मन में भी गहरे तक बैठी होती हैं, और यहीं से शुरू हो जाता है स्त्री का वो संघर्ष जो परिवार, समाज और मान्यताओं से लड़ते हुए स्त्री को स्वयं अपने आप से भी करना पड़ता है। एक स्त्री को स्वयं के साथ ही साथ सबसे ज्यादा संघर्ष अपनों के साथ करना पड़ता है।

भारतीय संस्कृति में स्त्री का स्थान पुरुषों से श्रेष्ठ माना जाता रहा है, उसे शक्ति, विद्या और ऐश्वर्य के रूप में आदिकाल से ही पूजा जा रहा है। अर्धनारीश्वर के रूप में शास्त्रों से लेकर साहित्य तक नारी का महत्त्व दृष्टव्य है। जबकि आज की वास्तविकता इसके विपरीत है। हमारे सभ्य और सुसंस्कृत समाज में स्त्री के लिए सबसे पीड़ादायी और आपत्तिजनक स्थिति उसे मात्र उपभोग और शोषण की वस्तु मान लेना है। संवेदनाओं से संवाद करती स्त्री पराधीनता, असहायता और दासता से मुक्ति के लिए सदियों से संघर्ष करती आ रही है।

बीसवीं सदी में पश्चिम में नारी दिवस मनाने की शुरूआत भले ही हुई है। लेकिन भारत में इसके सूत्र प्राचीन काल से ही देखने को मिलते रहे हैं। सर्वविदित है कि विश्ववारा, लोपामुद्रा एवम् अपाला आदि ने ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना की है और गार्गी जब याज्ञवल्क्य के साथ संवाद करती है तब वह सम्पूर्ण स्त्री जाति की अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही होती है। आज भोगे हुए यथार्थ का संघर्ष वर्तमान के स्त्री लेखन में भी साफ दृष्टिगोचर है।

लेकिन जहाँ एक ओर भारतीय स्त्री-चिंतक स्त्रीवाद का देशज मॉडल गढ़ने में लगा है... वहीं दूसरी ओर मूलाधिकारों से वंचित, शोषित और दमित स्त्री का वास्तविक गुनहगार किसे कहा जाएगा। यह प्रश्न आज भी ज्यों का त्यों है। महान विचारक अरस्तू के कहे अनुसार कि कुछ विशेष गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ केवल स्त्रियाँ हैं, यह कथन आज बिल्कुल बेमानी सिद्ध हो चुका है। माना कि आज भी कुछ स्त्रियाँ अशिक्षा, अज्ञानता और पराधीनता के कारण अपूर्ण और अशक्त हैं लेकिन यह प्रतिशत आज बहुत कम है।

असंख्य अंतर्विरोधों के चलते यह देखना सुखकारी है कि स्त्री की उड़ान जारी है। आज जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर स्त्री के हस्ताक्षर नहीं हैं। वर्तमान में स्त्रियों ने धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाजों की पुरातन बेड़ियाँ तोड़ डाली हैं। शिक्षा और आत्मनिर्भरता उनमें ऐसा आत्मविश्वास भर रही है जिससे उनकी राह सरल और सुगम बन रही है। आज हमें अपने साथ ही साथ अपनी बेटियों को इतना शिक्षित करना है कि जीवनयापन और स्वयं के लिए कोई भी निर्णय लेने के लिए उन्हें किसी पर भी आश्रित न होना पड़े। आज उन्हें दहेज की नहीं बल्कि शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा का समान अधिकार ही महिला सशक्तीकरण है।

वर्तमान में स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर नहीं है। उसे केवल अपनी मजबूती को महसूस करते हुए प्रमाणित भी करना है, अपनी मानसिक कमजोरी को आपको स्वयं दूर करना है। अपने हक और सम्मान के लिए लड़ते हुए उसे हर अंधेरी उदासी को दूर कर, अपने हिस्से की खुशियों को हासिल करना है। जिसके लिए उसे अस्मिता, अधिकार और अस्तित्व का यह संघर्ष जारी रखना होगा और देखना वो दिन अधिक दूर नहीं है जब स्त्री दिवस के शोर-शराबे से निकल हर दिवस पर स्त्री का नाम लिखा होगा।

- पारुल तोमर