
एक पुरानी सी साइकिल, जैसे ही मोहल्ले में घुसती है, गली में सुस्ता रहे कुत्ते अचानक सतर्क हो जाते हैं। उनका भौंकना और गुर्राना झेलते-झेलते वो साइकिल एक घर की ओर बढ़ती है। उस पर से एक आदमी उतरता है और हैंडल पर टंगे झोले में कुछ टटोलता है।
दरवाजे के दूसरी ओर आंगन में पड़ा बोर होता बच्चा गेट के नीचे से जूतों को झट से पहचान जाता है। इससे पहले कि दरवाजे की घंटी बजे, घोषणा कर दी जाती है - मम्मी, पोस्टमैन आया है!" दरवाजा खुलता है, पहचान होती है, और हाथों में मिलता है कागज का लिफाफा।
इसके बाद चार फुट की ऊंचाई से लिफाफे को कौतुहल से ताकती दो बटन-रुपी आंखें.. अब वो आंखें पुरानी हो रही हैं, वो दौर भी पुराना हो चला है। पर वो साइकिल आज भी मौजूद है, और मौजूद है वो झोला भी, मौजूद है वो पोस्ट, जहां से ये साइकिल रूकती-बढ़ती थीं । बहुत कुछ बदला है इसके साथ...ये ख़ुद भी कितना बदल गया। आइए नजर डालते हैं इस संदेशा प्रणाली के जन्म से आधुनिकीकरण तक की कहानी पर।
पिलर बॉक्स में चिट्ठियां
प्राचीन ग्रीस और मिस्र में जहां घुड़सवार संदेशों को ले जाया करते थे, वहीं अन्य साम्राज्यों में कबूतरों (होमिंग पिजन) द्वारा यह कार्य होता था। पत्र भेजने का यह तरीका लम्बे समय तक चलता रहा, जब तक आधिकारिक रूप से डाक व्यवस्था समाज में नहीं आई।
ब्रिटेन के शासक हेनरी सप्तम द्वारा स्थापित 'रॉयल मेल' को 31 जुलाई, 1635 में जनता को सौंपा गया। उस जमाने में लोग चिट्ठियां 'पिलर बॉक्स' में डाला करते थे। फिर जब 1842 में पोलैंड ने सार्वजनिक पोस्ट बॉक्स की शुरुआत की, तब खत इन डिब्बों में आराम फरमाने लगे। धीरे-धीरे डाक में वो सारी चीजें जुड़ती गईं जिनसे हम वाकिफ हैं। मेल कोच, मनी ऑर्डर, टेलीग्राफ और...स्टाम्प।
छोटे से टुकड़े ने की कायापलट
दुनिया का पहला डाक-टिकट था ब्रिटेन का ही 'पेन्नी ब्लैक', जो 1 मई, 1840 में सबके सामने आया। रोलैंड हिल द्वारा ईजाद किये हुए इस डाक-टिकट की कीमत थी एक पेन्नी। यह पोस्टेज की कीमत थी, जो तय थी और जिसे भी चिट्ठी भेजनी होती, उसे चुकानी होती।
जब से यह छोटा सा टुकड़ा डाक की दुनिया में आया, उसकी तो कायापलट हो गई। पोस्टेज कीमत ढंग से न मिल पाने से बेतरतीबी झेल रहा डाक अब सुव्यवस्थित हो चला था! अब तो डाक-टिकट कई तरह के हैं। एयरमेल, मिलिट्री, कोमेमोरेटिव डाक टिकट वगैरह वगैरह। जितने विभिन्न ये टिकट होते हैं, उतने ही इनको जमा करने के शौकीन भी। 'फिलैटली' नाम है इस शौक का ।
डाक दुनिया को एक शौक दे गया, लेकिन इसने दुनिया को जरूरत के वक्त में सबसे बड़ा सहारा भी दिया। प्रथम विश्व युद्ध का वक्त था, टेलीग्राफ दफ्तरों पर भीड़ लगी रहती थी। सबको सन्देश भेजने की जल्दी। और जल्दी-जल्दी इन संदेशों को साइकिल पर पहुंचाते किशोर लड़के-लड़कियां। टेलीग्राम ने ही संकट की घड़ी में लोगों को आपस में जोड़ा। पर सबसे अहम था जिमरमैन टेलीग्राम, जिसके कारण ही अमेरिका विश्व युद्ध में कूद पड़ा था।
टूट गया एक तार
डाक चल रहा है। निरंतर। लेकिन घाटे में चल रहे उसके एक अंग, टेलीग्राम, को उससे अलग करना पड़ा। अमेरिका ने अपनी टेलीग्राफ सर्विस 2006 में रोक दी। तो वहीं, हमने भारत में इस पुराने साथी को 14 जुलाई, 2013 की रात 9 बजे भावपूर्ण विदाई दी। भारतीय डाक विभाग फिलेटली, आर्मी पोस्टर सर्विस, इलेक्ट्रिॉनिक इंडियन पोस्टल ऑर्डर, डाक जीवन बीमा, पोस्टल सेविंग्स, बैंकिंग, डाटा संग्रहण, ई-कामर्स डिलीवर जैसी सेवाएं उपलब्ध करवा रही हैं।
भारतीय डाक सेवा
भारत को अपनी डाक सेवा मिली मार्च 1774 में। हालांकि तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपनी जेब भरने के लिए ही स्थापित किया था। भारत का पहला पोस्ट ऑफिस कोलकाता में वर्ष 1727 में शुरु हुआ था। भारत को भी डाक से जुड़ी सारी बातें पता चलने लगीं। 1852 में उसे भी अपना पहला डाक टिकट मिला - सिंध डाक।
लाख या चमड़े पर लगी ईस्ट इंडिया कंपनी की सील जल्दी टूट जाया करती थी, इसीलिए कुछ समय बाद इन्हें सफेद रंग के कागज पर गोल आकार में उभारा गया। पर सफेद रंग डाकियों को रात में देखने में परेशानी देता था, तो इन्हें नीली स्याही पर छापा गया।
इसी तरह भारत को टेलीग्राम भी मिला, जो 1854 में जनता के लिए खोल दिया गया । 'तार आया है!'यह वाक्य कई दशकों तक गूंजता रहा अपने यहां। तकनीक का जब साथ जनता को मिलने लगा, तो इस पुराने यार दूरी बनानी शुरु कर दी। लोग अब जवाब आने का कई दिनों तक इंतजार नहीं कर सकते थे। इलेक्ट्रॉनिक मेल जो मिल गया था। शार्ट मैसेजिंग सर्विस के आगे टेलीग्राम धीमा लगने लगा था।
आज भी जिंदगी में शामिल
बेशक, संचार माध्यमों में निए नए विकास के चलते आज हम इस माध्यम पर उतना निर्भर नहीं हों, जितना पहले थे, पर आज भी ये रहता तो है हमारी जिंदगी में। परीक्षा के एडमिट कार्ड का इंतजार हो, बैंक से आने वाला एटीएम कार्ड, सरकारी दस्तावेज, रक्षाबंधन पर आने वाली राखी...वो बटन-रुपी आंखें इतने सालों के बाद, दरवाजे पर तकी हुई, चमक उठती हैं, जब हाथ में महसूस होती है वही कागज की जानी-पहचानी छुअन। लिफाफा खुलते ही नेपथ्य में 'डाकिया डाक लाया' गीत फेड होता जाता है।
भारतीय डाक व्यवस्था से जुड़ी कुछ अहम बातें
- ई-कॉमर्स भारतीय डाक विभाग के लिए एक वरदान साबित हुआ है। मार्च 2016 तक ई-कॉमर्स कंपनी के लिए विभाग द्वारा कैश ऑन डिलिवरी के तहत एकत्रित राशि 15,00 करोड़ रुपए थी। 2014-15 में यह 500 करोड़ और 2013-14 में 100 करोड़ रुपए था। हाल ही गंगाजल की ब्रिकी भी शुरू हुई है।
- सबसे ऊंचा पोस्ट ऑफिस हिमाचल प्रदेश (15,500 फीट) के हिक्किम में है।
- 9 से शुरु होने वाले पिन कोड आर्मी पोस्ट ऑफिस के होते हैं।
- देश के बाहर स्थापित पहला भारतीय डाकघर 1983 में अंटार्कटिका के दक्षिण गंगोत्री में स्थापित हुआ था।
Published on:
09 Oct 2016 08:27 am
